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सोमवार, अगस्त 07, 2017

           धर्म ( कहानी )
         अभी -अभी परसों की बात है ,अरविन्द जी पूरे जोर -शोर से धर्म की वकालत किये जा रहे थे कि तभी हमदम जी आ खड़े हुए थे ,और हम लोगों ने उन्हें बाइज्जत कुर्सी पर बैठा लिया था ,वे भी पूरे मनोयोग से हम लोगों की बातों में मशगूल हो गए थे ,किन्तु उनके धैर्य का बांध उस समय टूट गया जब अरविन्द जी की हाँ में हाँ मिलाते  हुए मनोज जी भी बोल पड़े -'भाई कुछ भी हो मैं धर्म की निंदा नहीं सुन सकता। धर्म की निंदा सुनना भी धर्म के विरुद्ध आचरण करना है। '
      तभी हमदम जी बोल पड़े थे -'मान्यवर मनोज जी !मैं आप की भावनाओं की कदर करता हूँ किन्तु सच पूछिए तो आप की तरह ही और लोगों की भी मानसिकता बन गई है जिसका लाभ ये सफेद-पोश नेता उठा रहे हैं और भेंड़ बकरियों की तरह जब जी चाहा आप हमको हलाल कर उसके  खून से राजनीति की चादर का कलेवर बदल ले रहे हैं। धर्म स्वर्ग का रास्ता जरूर प्रशस्त करता है किन्तु सत्य तो यह है कि इस धर्म ने नरक  मचा रखा है नरक । आज देश में जो कुछ हो रहा है सब धर्म के पीछे ,हिन्दू मुसलमान के दंगे धर्म के पीछे ,मंदिर मस्जिद के झगड़े 
धर्म के पीछे ,बार -बार का असमय चुनाव धर्म के पीछे ,देश का बंटवारा हुआ वह भी धर्म के पीछे ,जगह- जगह ईशाई मिशनरियों का खुलना और उन्हें प्रश्रय देना यह सब धर्म की ही आड़ में हो रहा है। और सारे राजनीतिज्ञ किसी न किसी को धर्म मोहरा बनाकर अपनी राजनीति की रोटी सेंक रहे हैं। मलिन वस्तियों में , आदिवासी क्षेत्रों में आप को जो निःशुल्क सेवा भाव या जरूरत से ज्यादे आर्थिक लाभ किसी धर्म ,पंथ ,सम्प्रदाय विशेष को मैं रहा है वह धर्म का असली स्वरूप  नहीं है। आज धर्म की स्थिति ठीक हाथी के दांत  जैसी हो गयी है। '
        अब तो उपासनों स्थलों को सामरिक स्थल व कुत्सित मनोभावों की भावनाओं को पूर्णता की ओर  अग्रसर करने का  साधन बनाया जा रहा है।
     तभी मिश्रा जी बोल पड़े -'आप लोगों ने धर्म की चर्चा  छेड़ कर मुझे भी धर्म संकट में डाल  दिया।  हमको तो लगता है कि धर्म की परिभाषा ही बदल गयी है ,बेटा मनोज !धर्म यह नहीं है ,जो देख रहे हो। धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं है। '
   हमदम जी ने बीच में ही उनकी  बात को लोकते हुए कहा -'आप एकदम ठीक कह रहे हैं धर्म हिंसा नहीं सिखाता ,धर्म दूसरे के उपासना स्थल पर अनधिकृत कब्जा क्र बर्चस्व दिखाने या वहां तोड़ -फोड़ करने या उसे अपवित्र करने का आदेश नहीं देता है धर्म समभाव सिखाता है ,धर्म एक का आदर करना सिखाता है ,अहिंसा का दूसरा नाम धर्म है ,और ये बातें सभी धर्मग्रंथों में लिखी हैं चाहे वह नानक का ग्रंथ हो या पैगंबर का कुरान अथवा हमारे ऋषियों का उपनिषद या फिर ईशू का बाइबिल सभी अहिंसा के पक्षधर हैं ,फिर भी सारे धर्मावलम्बी आपस में झगड़ते रहते हैं ,और जिद्द थान हमको आपको लड़ाते रहते हैं। 
    मिश्रा जी पुनः बोल पड़े -' भाई हमदम जी !यही तो इस देश का दुर्भाग्य है कि प्रत्येक व्यक्ति समीक्षा नहीं करता बल्कि लकीर  का फकीर बना इन नेताओं व पाखंडी धर्मगुरुओं की आवाज पर मरने -काटने को तैयार हो जाता है। '
        'आज धर्म की महिमा का गुणगान करके राजनीतिज्ञ हो या धर्मगुरु या फिर छद्मवेषी धनपशु सब के सब धर्म की आड़ में अपनी-अपनी झोली भर रहे हैं ,अपने स्वार्थ की पूर्ति  कर रहे हैं ,या यों कहिये की लंबा -चौड़ा बोर्ड लगाकर मठ  मंदिरों में राजसुख भोग रहे हैं। आये दिन अखबारों में बहुत कुछ अकथ्य घटनाएं प्रकाशित होती रहतीं हैं ,फिर भी धर्मभीरु लोग शिकार होते रहते हैं। आप ने कभी किसी नेता या धर्मगुरु को शर्म के लिए शहीद होते सुना  है ?नहीं ,नहीं सुने होंगे ,क्योंकि उनका लक्ष्य भावनाओं की चिंगारी से आग का प्राकट्य कर भोली भाली धर्मभीरु जनता को लकड़ी के रूप में प्रयुक्त कर धर्म की भठ्ठी में अपने स्वार्थ की रोटी सेंकना है। इसलिए यह सब कब तक चलता रहेगा कुछ नहीं कहा जा सकता। आप सब ने दीपक को देखा है न ?वह स्वयं जलता है तब दूसरों के लिए प्रकाश की व्यवस्था करता है परन्तु यहां सब कुछ उलटा है ,एकदम  उलटा। '
      'और फिर हम कहते हैं कि मानव धर्म से बढ़कर भी कोई दूसरा धर्म है क्या ?,जिस दिन मनुष्य मनुष्य की पूजा करने लगे ,एक दूसरे का दुःख दर्द समझने लगे उस दिन यह धरती स्वर्ग हो जाय स्वर्ग। रही  धर्म की बात तो धर्म तो सचमुच  बड़ी ऊंची चीज है -'धर्मो रक्षति रक्षितः 'धर्म के वगैर तो हम एक कदम भी नहीं चल सकते ,धर्म के अभाव में हम क्या   हमारा पूरा समाज ही बिखर जाएगा। आज हमारे समाज या घर परिवार में जो भी संस्कार या लाज लिहाज बचा है , सुरक्षित है वह सिर्फ धर्म के नाते ,इसीलिए कहा  है कि ''यतो धर्मस्ततो जयः ''.क्या विडंबना है एकांत कमरे में जब हम अपनी बहन बेटी बुवा के संग होते हैं तो हमारे मन में किसी प्रकार का विकार नहीं आता ,परन्तु वहीं परायी कन्या या कोई महिला होती है तो हम कर्मणा भले ही पाप से वंचित होते हैं किन्तु मनसा और कभी -कभी वाचा पाप तो कर ही बैठते हैं।  धर्म अकेले में भी हमारा मार्ग दर्शन करता है। 
     'धर्म ही है जिसके कारण मुसलमान भी निकाह करते वक्त दूध का बराव  करते हैं। धर्म ही हम किसी पराई कन्या या बहन से एक मामूली कच्चा धागा हाथ में बंधवा लेते हैं तो उसकी रक्षा में अपना बलिदान तक कर डालते हैं।  अपने बड़े बुजुर्गों का सम्मान करते हैं ये धर्म है ,जिसका नमक खाते हैं उसके प्रति वफादार बने रहने का प्रयत्न करते हैं ये धर्म ही है। धर्म बड़ा विस्तृत है और बड़ा ही कठिन। 'यह कहते - कहते उनकी आँखें छलछला आयीं।  
   यह सुन पाकर हमदम जी ने कहा -'आदमी को इतना भावुक भी नहीं होना चाहिए। आदमी भावुकता में दिल का मरीज हो जाता है ,फिर आप तो हम सबमें सबसे बुजुर्ग हैं ,समाज और दुनिया को काफी निकट से देखे हैं भला आप को हम लोग क्या समझाए',,,,,.बीच में ही बात काटते हुए मिश्रा जी बोल पड़े -
     हमदम जी !मुझे भी धर्म ने बाँध लिया है समझ में नहीं पा  रहा हूँ कि कैसे निकलूँ ,निकल तो क्या पाऊंगा अपने धर्म का निर्वाह कर सकूँ यही बड़ी बात है ,ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हे नाथ !मुझे ऐसा बल दो की तुम्हारे द्वारा बांधे बंधन के दायित्व का निर्वाह कर सकूँ। 
    कैसा दायित्व मिश्रा जी ?हमदम जी ने आश्चर्य भरे शब्दों में पूछा। 
    मिश्रा जी ने थोड़ा रुक कर कहना शुरू किया -'हमदम जी उन दिनों की बात है जब मैं नयी -नयी नौकरी पाया था। उसी समय गले में फोड़ा से परेशान होकर डाक्टर को दिखाने पटना आ पहुंचा। डाक्टर ने बताया कि रोग अंदर ही अंदर इतना बाद गया है कि तत्काल आपरेशन न हुआ तो यह रोग आप के लिए घटक सिद्ध हो सकता है। और मैं बिना कुछ सोचे बिचारे वहां एडमिट हो गया। 
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