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शुक्रवार, जून 05, 2015

परदे के पीछे ( कहानी ) ;डा .उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन '



प्रिय स्नेही !
तुम्हारा खत मिला | तुमने लिखा है कि यहाँ बहुत अच्छी  सुविधा है , जिनके यहाँ रहता हूँ वे बहुत उपकारी जीव हैं ,उन्होंने मुफ्त में रहने को हमें कमरा दे रखा है , केवल एक घंटा उनकी लड़की को पढ़ा देता हूँ|
बंधु ! मगर मेरी दृष्टि में तुम्हारी यह भूल है , हाँ वैसे लाख में एकाध आदमी मिल जाते हैं जो उसी के लिए होते  ही हैं , मात्र परोपकार के लिए | पर उनकी बात जुदा है | तुम नहीं जानते हो , मनुष्य बहुत बड़ा स्वार्थी जीव है | और उस पर भी आज का ! आज का तो हर मानव थोड़ा देता है और बहुत पाने की  चाह रखता है ,जैसे भी हो केवल पाना चाहता है | इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं | तुम भी तो मुफ्त में कहाँ रहते हो ? एक घंटा बदले में पढ़ाते जो हो | और सुनो – हम तुम्हें सुनाते हैं इसी तरह की एक घटना –कहानी नहीं यथार्थ ,सही घटना '–सीमा थी न , कहोगे कौन सीमा? मैं जानता हूँ तुम्हारे हृदय में उथल –पुथल होगी ,प्रश्न उठेगा कि आखिर ये सीमा कौन है ? घबराओ नहीं धैर्य रखो , तुम इसे जानते हो ,नाम से नहीं ,आकृति से |
याद होगा तुम्हे , आज से छः महीने पूर्व जब हम यहाँ आये थे मकान बदल कर ,तब तुम भी साथ थे | पहले यह कमरा तुम्हें ज़रा भी पसंद नहीं आया फिर दो – चार दिनों बाद अच्छा लगने लगा था | तुम्हें ही नहीं ,हमें भी | लेकिन सच पूछो तो अब जी घबड़ाता है इस कमरे से | अगले महीने में इसे छोड़ दूंगा | जानते हो क्यों ? सुनो –
एक तो सबेरे उठते ही बहुत बड़े पापी का दर्शन होता है जानते हो कैसा पापी ? नहीं जानते होगे , सुनाऊं  तब तो जानो ! अच्छा सुनो –
जब कमरे में आये थे तो तुम्हारी नजर कहाँ गयी थी , याद है न ? सामने सीढ़ी के नीचे ,जहाँ  एक लड़की बैठकर रूपये पैसों की रेजकारी दिया करती थी और जानकर कभी –कभी अपनी जुल्फों को कपोलों पर गिरा – गिरा हटाया करती थी जानते हो क्यों ? उसमें भी कुछ राज था ! उसी का नाम तुम्हारे चले जाने के बाद सुना कि ‘ सीमा  ‘ है |
सच , कितनी सुंदर थी एकदम फूल जैसी ! तुमने हँसी में कुछ कहा भी था , याद है ? तुम्हे याद हो न या न हो पर मुझे याद है किन्तु लिखूँगा नहीं | हाँ तुम्हे उस दिन बुरा लगा था न ? जब सामने के छत पर वही सीमा आकाश की तरफ मुख किये लेटी  थी , नहीं- नहीं ओंधे मुँह लेटी  थी | और कोई एक अधेड़ व्यक्ति जिसकी उम्र करीब पचास के रही होगी उसे चादर ओढ़ा रहा था , ओढ़ाया भी | और हवा में जब चादर की छोर उड़ –उड़ जा रही थी तो उसके नाजुक पाँव अपने हाथों से उठाकर चादर को पाँवों के नीचे दबा दिया करता था |
तब तुमने हमसे कुछ पूछा था , यह कि –ये इसका बाप है या ससुर ? फिर तुमने ही कहा था – नहीं, दोनों ही नहीं हो सकते , क्योंकि दोनों ही ऐसा नहीं कर सकते | जवान बहू या बेटी के साथ , जिसकी उम्र बीस या बाईस की हो | और सुनों – सच निकला ,वह उसका बाप नहीं था |
एक दिन आज से पाँच महीने पूर्व ,तुम्हारे जाने के एक माह बाद ,हमारे ऊपर के कमरे में जो नगर पालिका का क्लर्क रहता था न ? अभी भी रहता है , वही बता रहा था ,जानते हो क्यों ? चोरी में पकड़ा गया था इसीलिए , रुपये –पैसों की चोरी नहीं , इज्जत की |
उसी दिन रात को दस बजे के करीब वह क्लर्क सीमा को अपने कमरे में लाया था ,संग में नहीं ,केवल इशारा भर कर दिया था और वह चली आयी थी | फिर जानते हो क्या हुआ ? बहुत कुछ जो कहा नहीं जा सकता | उस क्लर्क से मेरे बारे में भी पूछती रही कि – ‘ ये कौन है ? और क्या करता है ? और इसकी शादी हुई है या नहीं ? ‘
फिर जब वह जाने लगी तो आहट पाकर मैं अपने  कमरे से बाहर निकला लघुशंका करने के लिए | और मुझे देखते ही काठ सरीखे दोनों सन्न रह गए |
जब लघुशंका करके लौटा तो वह जा चुकी थी | फिर धीरे से कमरे का दरवाजा सटाकर मैं पढने लगा तभी किसी ने दरवाजा खोला , मैं देखा तो सामने वही क्लर्क अधरों पर सूखी हँसी लिए खड़ा था |फिर मैंने धीरे से उसे बैठने के लिए कहा , और पूछा ‘ कहिए क्या सेवा करूँ आप की ?’ तो उसने हँसते हुए कहा –‘आज कुछ बताने आया हूँ आप को |’ यह सुनकर मेरा कौतुहल बढ़ गया और मैंने कहा – सुनाइए |
   फिर जानते हो क्या सुनाया उसने ? सीमा की कथा सुनाने लगा ,तब मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई उपन्यास पढ़कर सुना रहा हो |
‘ये लड़की है न , जिसका नाम सीमा है , बहुत दुश्चरित्र है |’ मैंने मन ही मन कहा – ‘तुम बड़े सच्चरित्र हो , पापी कहीं के ! फिर उसने ही कहा ‘ है नहीं ,बनायी गयी है | ‘
 
मैंने पूछा –‘कैसे ?’
    तब कहने लगा –‘ पहले, आज से अठारह साल पहले ,जब यह बच्ची थी मात्र दो साल की , इसकी माँ भिखारिन थी , जो इसी सड़क पर बैठकर भीख माँगा करती थी और भीख मांगते –मांगते एक दिन इस धरा-धाम से चल बसी | उस समय यही बुढ़िया जो आज इसकी माँ बनी है ,लोगों से कह सुनकर –ज्यादे कहना भी नहीं पड़ा , आख़िर भिखारी के बच्चे को रखता भी कौन ,उठा ले आयी | तब लोगों ने इस बुढ़िया  को काफी सराहा था |
   लेकिन उस समय कोई क्या जानता था कि बुढ़िया के मन मन क्या है | जब धीरे – धीरे यह सात वर्ष की हो गयी तो यहीं घाट किनारे माला – फूल की दुकान खोलकर बैठा दी |
  और बारह की होते ही ,यही बुढ़िया जो माँ बनी थी ,बदलकर जाने क्या हो गयी , जिसकी कोई संज्ञा नहीं | और उस किशोरी से अनाचार कराने लगी | और इस तरह बारह  से अठारह के बीच खूब पैसा कमायी |
उसके बाद फिर कहीं दूर गाँव में इसकी शादी कर दी | पर जाने कैसे इसके शौहर को इसकी पुरानी करतूतों का पता चल गया , और वह घसीट कर इसे यहाँ कर गया | तब से फिर ये न वहाँ  गयी और न वह लेने ही आया | और फिर यूँ ही रातों में जैसे मेरे यहाँ आयी थी , वैसे ही नाज – नखरे बना -बनाकर लोगों के पलंग की शोभा बनने  लगी | ‘
    उस दिन इतना ही सुना था , उस क्लर्क से | मगर अभी - अभी चार दिन हुए जो आँखों से देखा है , उसे सुना रहा हूँ सुनो –
    तकरीबन सात माह पहले उसी बुढ़िया का भतीजा आया था और बुढ़िया को  बुलाकर ले गया ,उसकी माँ की तबीयत ख़राब थी | फिर सीमा स्वतन्त्र होकर उसी बूढ़े की देख –रेख  में रहने लगी |
    छः महीने बाद बुढ़िया लौटी तो पता चला कि सीमा माँ बनने वाली है | फिर जानते हो क्या हुआ ? बुढ़िया का मालिक बूढा जो बाप सरीखा था और रात को सीमा को गोद में लेकर सोता था , वह उसे बड़ी मार मारा कि तुमने ऐसा होने क्यों दिया , बताया क्यों नहीं |
      तब शाम को जब वह क्लर्क आया तो सीमा दौड़ी –दौड़ी कराहती हुई उसके पास आयी सहायता माँगने और दर्द  भरे स्वर में कहने लगी –‘अब इस नारकीय जीवन से मुझे घृणा हो गयी है | मुझे कहीं ले चलिए , मैं आप की ही होकर रहूंगी , केवल आप की | और यदि आप को भी मुझसे घृणा हो तो कुछ दिनों के लिए ही ठौर दे दीजिए , जब पैर हल्का हो जाएगा तो फिर कहीं और चली जाऊँगी ,पर यहाँ न रहूँगी | ‘
   लेकिन उसे ठौर न मिला | रात को पता नहीं कैसे एकाएक उसकी हालत ख़राब हो गयी ,फिर सुबह वही बूढा उसे अस्पताल ले गया भरती कराने | वहाँ  पता चला कि बच्चा पेट में बेड़ा हो गया है , सीमा की प्राण रक्षा के लिए आपरेशन करना होगा , छोटा होता तो गिर भी जाता मगर छः महीने का है |लेकिन हुआ क्या जानते हो ? आपरेशन की तैयारी हो ही रही थी कि सीमा का प्राणान्त हो गया |
    और सुनो –‘ पहले इसी सीमा से मुझे भी घृणा होती थी , मगर अब उसके नाम पर तरस आ रही  है, पता नहीं क्यों ?
                    रचना काल १९७९ ई ० ‘


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