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बुधवार, जून 17, 2015

वह जा न सका[कहानी ] :डा उमा शंकर चतुर्वेदी "कंचन"


      समाचार –पत्र पढने के बाद एकाएक श्याम की विचारश्रृंखला जाने कैसे वर्षों पीछे चली गयी और याद आया उस दिन काफी देर की प्रतीक्षा के बाद अपने निश्चित समय से डेढ़ घंटा लेट गाड़ी आयी थी |
  और गाड़ी में भीड़ इस कदर थी कि पाँव रखना दूभर हो रहा था | जब कि उसे लखनऊ जाना अत्यावश्यक था | जेठ महीने की कड़ाके की धूप और लू अपनी चरम सीमा पर थी|आये दिन दो –चार ख़बरें अखबार में पढ़ने को मिलती थीं कि लू से अमुक जगह इतने मरे |
  भीड़ की हालत यह  थी कि लोग ट्रेन की छतों पर भी बैठे थे | उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे | तभी गाड़ी प्लेटफार्म से गार्ड के भिसिल के साथ सरकने लगी और अंततः बाध्य होकर एक डिब्बे के दरवाजे पर डंडा पकड़कर पांवदान पर खड़ा गया था |
  अगला स्टेशन आया तो उसने सोचा कुछ लोग जरूर उतरेंगे और उसे जगह मिल जायेगी , पर यहाँ और भीड़ दीखी | परिणामत :उसे ज्यों का त्यों अपने स्थान से चिपक जाना हुआ |
  लेकिन अब उसका हाथ भी दर्द से भर गया था | एक हाथ से बैग और दूसरे से डंडा थामे वह  किंकर्तव्य विमूढ़ सा बना रहा और पसीने से फिसल रहे हाथ को रह –रहकर भींचता रहा |
   गाड़ी छुक –छुक –छुक करती चली जा रही थी | सहसा एक मधुर आवाज कानों से टकरायी और उसने गर्दन घुमाकर देखा तो एक लड़की खिड़की से बाहर हाथ किये उसके बैग को थामें कह यही थी –‘भाईसाहब बैग मुझे दे दीजिये |’
   तब वह प्रतिकार न कर सका | बैग उसने दे दिया और  अच्छी तरह खड़े होकर कुछ सोचने पर मजबूर हो गया | इस बालिका का हृदय तो देखो , गाड़ी में और लोग भी तो हैं | यह बात और किसी के दिमाग में क्यों नहीं आयी ? शायद आयी होगी ,पर सोचते – सोचते अगला स्टेशन आ गया और गाड़ी धीमी होते –होते प्लेटफार्म पर जा लगी |
   उस स्टेशन पर कुछ लोग उतरे | डिब्बे में थोड़ी जगह हो गयी और उसको भी बैठने के लिए  सीट मिल गयी | और उसने ज़रा चारों ओर नजर दौड़ाई तो वही लड़की बगल में बैग रखकर एक हाथ में बन्दूक लिए अपने पास ही बैठी दीखी |
   उसके हाथ में बन्दूक देखकर यह समझते देर न लगी कि बन्दूक इसके किसी अभिभावक की है और यह किसी सम्पन्न घराने की है | फिर बगल में बैठे व्यक्ति की तरफ मुख़ातिब हो उसने अंदाजन पूछा था – ‘यह कन्या आप की ही है ?’
  ‘जी हाँ !’उस व्यक्ति ने मुस्कराते हुए कहा था |
   ‘बहुत भली है |’ उसने धीरे से कहा तो वह व्यक्ति ज़रा – सा मुस्कराया |
    बैठने को जगह मिल गयी थी , , पर गर्मी के कारण भीषण उमस थी और ऊपर से पसीने की दुर्गन्ध ! जी मिचलाने लगा उसका |
   कुछ देर बाद गाड़ी स्टेशन से खुली तो जैसे लोंगो को सांस मिली | उसने अपनी व्याकुलता पर काबू पाते हुए सहज भाव से उसी व्यक्ति से पुन :पूछा – ‘कहाँ तक जाना है आप को ? ’
  ‘लखनऊ ,आप को ?’
  ‘मुझे भी एक स्टेशन पहले तक जाना है |’
  चुनाव के दौरे में तो नहीं जा रहे आप ? बुरा न मानियेगा ,इस वेश - भूषा को देखकर ..... लड़की के पिता  ने हँसते हुए पूछा |
  ‘नहीं –नहीं .....इसमें बुरा मानने की क्या बात है | लेकिन मैं चुनाव के दौरे में नहीं जा रहा हूँ | वैसे आप के क्षेत्र से कौन खड़ा है ? ’
  ‘कांग्रेस सीट से एक लड़का खड़ा है , उसी का जोर – शोर है | नयी उम्र का है | दिनेश राय नाम है उसका |’
 ‘दिनेश राय ? क्या पतले छरहरे कद का तो नहीं है ? छोटी छोटी मूंछे रखता है , माथे पर चोट का निशाँ है ? ’
  ‘हाँ बिल्कुल सही , आपका अनुमान सच है | कैसे उसे आप जानते हैं ? ’
तब हँसते हुए श्याम ने कहा था –‘वह मेरा क्लाशफेलो रह चुका है | मेरे साथ ही उसने राजनीति से एम् .ए . किया था हिन्दू विश्व विद्यालय से | वैसे है तो कर्मठ और होनहार भला लड़का ! अप का क्या ख्याल है ? ’
  ‘हाँ , होनहार है यह तो मानूंगा | समाज - सेवा की भावना उसमें कूट –कूट कर भारी है | ग़रीबों के लिए तो वह मानों भगवान् ही है| अच्छा लड़का है और उसका व्यक्तित्व भी है , जीत जाएगा |’
  बातों –बातों में ही अगला स्टेशन आ गया | यहाँ गाड़ी देर तक रुकती थी | गाड़ी रुकी तो पिता उतरकर प्लेटफार्म पर चाय पीने चले गये |
  जलपान का समय हो चला था सो श्याम सोच रहा था कि क्या किया जाय | तभी खिड़की के सामने फलवाला ठेला लिए आ गया और उसने बिना विचारे आधे दर्जन केला खरीद लिए और अपनी सीट पर आ बैठा और धीरे से लड़की के मुख की तरफ देखकर बोला –‘लो खाओ |’
लड़की ने कुछ शर्माते हुए कहा –‘नहीं ,आप खाइये | मुझे भूख नहीं है |’
  ‘इसमें भूख की क्या बात है ? इससे पेट थोड़े ही भरता है | लो खाओ |’और फिर एक केला तोडकर उसके आगे किया |
  फिर वे दोनों साथ –साथ छिलके उतारकर खाने लगे |तब श्याम ने सरलता से पूछा –‘तुम्हारा नाम क्या है मुन्नी ?’
  ‘शालिनी |’
  ‘और पिताजी का ?’
  ‘ठाकुर केसरी सिंह ’
  ‘वाह ! नाम तो बड़ा सुन्दर है |पढती हो न ?’
 ‘जी –हाँ , आठवीं कक्षा में |’
  वह केला ख़त्म हो गया तो श्याम ने दूसरा उठाते हुए कहा –‘लो ,और लो |‘
  लड़की ने कहा –‘ नहीं, अब नहीं |’
  ‘यह नहीं होगा || तीं मैं खाया हूँ ,तीं तुम भी खाओ |’
  और उसके हाथों में दूसरा केला दे दिया \ वह हंसती हुई खाने लगी तो श्याम ने भी हँसते हुए पूछना शुरू किया –‘ बन्दूक चला लेती हो ?’
  लड़की ने हँसकर ही कहा –‘नहीं ,पिताजी चलाते हैं , मुझे नहीं आता बन्दूक चलाना |’
  ‘अच्छा , पिताजी तुम्हारे करते क्या हैं ? नौकरी ?’
 नहीं ,शहर से कुछ दूर पर खेती है ,सो वहीं खेती कराते हैं |’
   इतने में शालिनी के पिता  आ गये थे और इस तरह दोनों को बातें करते देख हंसने लगे थे |
   अगले स्टेशन पर श्याम जब उतरने लगा तो शालिनी सीट से उठकर खडी हो गयी और गोरे –गोरे  दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर हौले से बोली – ‘ नमस्कार !’
  श्याम उसकी मुद्रा को देखकर विह्वल हुआ तो पिता ने मुस्कराकर कहा –‘इसकी की ही सारी सीख है|भाई साहब , उसी की सारी छाप पड़ी है इस पर |’और फिर ट्रेन आगे बढ़ गई |
 और फिर दूसरा दृश्य आँखों के सामने आ गया –
  सालों गुजर गये  | ठीक से याद भी न रहा कि अचानक एक दिन कवी सम्मेलन में एक लड़की पर नजर रुकी , रंग उसका तनिक सांवला था ,पर मुख देखने पर लग रहा था , सुन्दरी है | असल में उसकी आँखें ऎसी थी न , सरल –सरल और लजीली –लजीली | और तस्वीरों वाली मछली सी उन आँखों से उम्र का अंदाजा भी सोलह सत्रह ही मिल रहा था | सो वह लड़की सामने आ खड़ी हुई और धीरे से लजाती हुई बोली –‘नमस्ते भाई साहब!’
  तब श्याम ने नमस्ते का उत्तर देकर उसके मुख –मंडल पर अपनी नजर गड़ा दी थी , जिसमें प्रश्नवाचक चिन्ह झाँक रहा था मानों वह पूछ रहा हो –‘तुम हो कौन ?’
 उसे चुप देख लड़की ने पूछा था –‘भाई साहब ! आपने मुझे पहचाना नहीं ? ’
  श्याम ने अचकचा कर कहा था –‘ नहीं , तुम्हारा नाम क्या है ? ’
  ‘शालिनी |’ उस सौम्य मुख वाली लड़की ने धीरे से उत्तर दिया था |   ‘ओ हो ,! शालिनी तुम ? अरे ,तुम इतनी लम्बी हो गयी ? मैं तो पहचान ही नहीं पाया|’
  तब शालिनी ने मुस्कराकर सिर नीचे कर लिया था और प्रसंग बदलते हुए पूछा था – ‘ आप भी कविता सुनायेंगे न ? ’
  और श्याम ने हँसते –हँसते ही कहा था – ‘हाँ , सुनाऊंगा |’
  और शालिनी सखियों की ओर भाग गयी थी |
   ......सम्मेलन प्रारम्भ हुआ | कई लोंगो के कविता सुनाने के बाद संचालक ने श्याम का नाम पुकारा |
  इस तरह कविताओं के कई दौर चले और प्रत्येक बार श्याम की कवितायें सुनकर लोगों ने तालियाँ पीती और वाह –वाह की | सम्मेलन समाप्त होने पर श्याम स्टेज से उतरा ही था कि शालिनी अपने पिटा को साथ लिए सामने आ खडी हुई थी और बाप –बेटी ने मिलकर उसकी तारीफों के पुल बाँध दिए थे |
   तब श्याम  मन ही मन खुश होता धीरे –धीरे मुस्कराता रहा | अपनी तारीफ भला किसे अच्छी नहीं लगती |
   ‘ अब कहाँ जायेंगे ?’शालिनी के पिटा ने पूछा |
   उत्तर में श्याम ने कहा था – ‘बस ,आज रात तो यहीं लाज में व्यवस्था हो गई है ठहरने की सो आराम करना है फिर कल सुबह की ट्रेन से गाँव चले जाना है |’
   यह सुनकर पिता ने स्नेह भरे शब्दों में कहा था –‘आप गाँव जायं या शहर ,इसमें हमें कोई सरोकार नहीं , परन्तु कल का भोजन मेरे यहाँ करके ही अप यहाँ से प्रस्थान करेंगे |’
   ‘ऎसी भी क्या बात है , फिर कभी आऊंगा तो कर लूँगा आप के यहाँ भोजन |’
   ‘ नहीं , यह सब मैं नहीं जानता वैसे तो आप जाने कितनी बार इस शहर में आये और चले गए होंगे ,वह तो जानें किस संयोग से आज भेंट हो गई , तो अब आप लाख बहाने करें ,पर आज मैं छोड़ने वाला नहीं |’
   अंत में बाध्य होकर श्याम ने स्वीकृति दे दी थी | दूसरे दिन श्याम जब शालिनी के पिता  के साथ भोजन करने बैठा था तो शालिनी ही दोनों थालियाँ लेकर आई थी |
   और फिर दोनों लोग मौन ही भोजन करने लगे थे | पेट भर गया तो दोनों ने हाथ रोक दिये | जब श्याम ने दृष्टि ऊपर उठाई तो देखा शालिनी कोने में खडी मुस्करा रही थी | आँखों में जैसे एक असीम परितृप्ति का भाव चमक रहा था |
   उस दिन श्याम शाम की ही गाड़ी से घर को चल दिया था | दरवाजे तक शालिनी और उसकी माँ विदा देने आयी थीं और स्टेशन तक पिता | और तीनों ने बार – बार यही कहा था कि फिर दर्शन दीजियेगा | और श्याम भाव विह्वल हो गाड़ी में बैठा निरंतर उन्हीं लोगों की बात सोचता चला आया था |
   और फिर तीसरा दृश्य दीखा –
   शालिनी कैसे खुश – खुशखे जा रही थी –‘भैया ,जब आप के आने का कार्ड मिला तो हम सबकी खुशी का ठिकाना न रहा | मैं अपनी सब सहेलियों से कह आयी थी कि –कवि  भैया आने वाले हैं | तुम लोग भी आना उनकी कविता सुनने |
  ठाकुर साहब श्याम को लेने ठीक समय से स्टेशन पहुँच गए थे और जब ठाकुर साहब के साथ घर पहुंचा था तो वही सलोना मुखड़ा इतने अरसे बाद एक बार फिर देखने को मिला था | 
   भोजन के पश्चात जब आराम कर रहा था तो उसने कैसे मीठे – मीठे स्वर में आकर पूछा था – रिकार्ड लगा दूँ भैया ?,बैजू बावरा का नया रिकार्ड खरीदा है |’
  तब श्याम ने स्वीकृति में सिर हिला दिया था और रेकार्ड  बजने लगा था –
   ‘आश निराश के दो रंगों से
   दुनिया तूने ....
   और जब वह रेकार्ड लगाकर जाने लगी तो श्याम ने उसे पुकार कर रोक लिया था और पूछा था – ‘ यहाँ पड़ोस में कोई सोहन सिंह रहते हैं ? ’    
  उसने बताया था – ‘हाँ रहते तो हैं|’
  ‘क्या करते हैं ?’श्याम ने गंभीरता से पूछा था तो पता चला कि यहाँ  पोस्ट आफिस में हेड क्लर्क हैं | 
  ‘उनकी सन्तान भी है कोई ?’
हाँ है तो | लड़की है एक , क्यों क्या बात है ?’
  तब श्याम ने कहा था ‘–अरी पगली ! बात है तभी तो पूछ रहा हूँ |’
  ‘तो बताइये न क्या बात है ? , लड़का तो उन्हें  है नहीं , बस एक लड़की ही है ,माया नाम है उसका |’
  ‘ तुम उसे अच्छी तरह जानती हो ?’
   ‘हाँ - हाँ ,खूब अच्छी तरह जानती हूँ | बताइये तो सही क्या बात है ‘वह तो मेरी सहेली है|’
   तब श्याम ने बतलाया था कि –‘ मेरे मित्र से उसकी शादी ठहरी है सो उसी मित्र के कहने पर देखने आ गया हूँ |वह तो तुम्हारी सहेली ही है , किसी बहाने बुलाओ न !’और शालिनी कमरे से बाहर हो गयी थी |
  फिर एक घंटा पीछे चार –पाँच सहेलियों के संग वह लौट आयी थी |उस समय श्याम किन्हीं गीतों की पंक्तियाँ गुनगुना रहा था |और फिर उसने बारी –बारी से सबका श्याम से परिचय कराया था और माया का परिचय देते समय थोड़ा – सा मुस्करा दी थी |
  तब श्याम ने पलकों को झपका कर माया को देखा था | माया का गेंहुआ रंग जवानी की भठ्ठी में तपकर मानों कुंदन बन गया था |  
  फिर परिचय के बाद उन सबों के आग्रह पर उसने एक कविता भी सुनाई थी |
  माया की शादी कहीं श्याम के गाँव में ठीक हो गयी | बारात गई और शादी भी हो गई , पर  किसी कारण वश श्याम मित्र की बारात में सम्मिलित न हो सका | और ठीक एक माह बाद डाकिया एक सुनहला कार्ड दे गया था | यह शालिनी की शादी का निमन्त्रण –पत्र  था |     
शादी पचीस तारीख को होनी थी | सो वहां जाने के लिए वह उसी दिन से तैयारियाँ करने लगा था | बाजार जाकर बनारसी साड़ी और जाने क्या –क्या सिंगार के सामान बहन को उपहार देने को ले आया था | पर दुर्भाग्यवश उस बार भी वह  न जा सका | अचानक चौबीस तारीख को ही भोर में उसे तार मिला और वह पटना चला गया | सोचा था ,किसी  न किसी तरह दूसरे दिन शालिनी के गाँव पँहुच जाऊँगा परन्तु हाय,सोचा हुआ न हुआ |
  सहसा मस्तिष्क को जैसे झटका लगा और फिर चौथा दृश्य दीखा | आज से केवल पाँच  दिन पहले का |
   आफिस में छुट्टी थी ओ वह घर की सफाई में लगा था | आलमारी में किताबों को करीने से सजा हा था कि नीचे ए सांकल खड़खड़ा उठी | सोचने लगा ,दूधवाला आया होगा | पर यह क्या ! देखा कि सामने एक  नारी मूर्ति  खड़ी है और उसके मुँह से एकाएक निकल गया –‘अरे ! शालो तुम !’
   ‘हाँ , भैया मैं |’और फिर वह चरण छूने को झुकी ही थी कि ह्यम ने बीच में ही दोनों हाथ पकड़ कर उस उठा लिया था |
  फिर धीरे –धीरे बातों  के जरिये मालूम हुआ था कि अपने पति के साथ वह यहीं नरहरपुरा में रह रही है |
   और जब यह पूछा कि कैसे मेरा पता तुम्हें मालुम हुआ तो शालिनी ने बताया था –‘दस पन्द्रह दिन पहले एक पत्रिका में आप की एक कहानी अचानक पढ़ने को मिल गयी थी | उसमें पता भी छपा था | उसी को याद करती चली आयी |
   तब श्याम ने पुन : पूछा था – ‘शालिनी अज तुम उदास सी क्यों हो,क्या बात है ? तवीयत ठीक है न ?  और हाँ तुम्हारे श्रीमानजी कहाँ है ,अकेली आयी हो क्या ?’
   पलभर में ही तब शालिनी की दोनों आँखें आंसुओं से पुरनम हो आयीं  और  रुँधे गले से वह कहने लगी –‘उनको पता चलता तो शायद वे मुझे आने भी न देते | मई तो जनम  की ही अभागिन ठहरी |जन्मते ही भाई को कहा गई और विवाह के ही साल पिटा जी एक्सीडेंट में चल बसे | उसी दुःख में माँ भी चार माह पीछे दुनिया छोड़ गयी | और अब मैं  हूँ जो इनके लिए सिर का बोझ बनी हुई हूँ | दिन - रात मेरे पिटा के लिए कहते रहते हैं कि –‘साला मरते समय प्रापर्टी भी मेरे नाम नहीं कर गया | मुकदमा लड़ने को छोड़ गया पट्टीदारों से |’
   तब श्याम ने समझाया था – ‘शालिनी ! आजकल सभी लड़केवालों का यही हाल है | पैसों के भूखे हैं सब , उनके सामने मानवता नाम की कोई चीज है ही नहीं | जो कुछ है बस पैसा है , पैसे के लिए वे सब कुछ भी कर सकते हैं | लेकिन तुम इन सब छोटी – छोटी बातों की चिंता करोगी तो कैसे चलेगा ? इन्हीं चिंताओं में तुम अपनी शरीर
घुला बैठी हो |’ 
   भैय्या ,मैं क्या कहूँ ,आप ने तो उन्हें कभी देखा नहीं है | कहूँगी तो शायद विशवास भी नहीं करेंगे ,और पति हैं न , उनकी निंदा भी कैसे करूं ?’
  ‘ निन्दा का सवाल नहीं है शालो ! सवाल हकीकत का है | जो सच है उसे कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए |संकोच मत करो ,कहो ,सही –सही बात क्या है ,जो सच है उसे बताओ |’
  तब रुँधे गले से ही सिसकियों के बीच शालिनी धीरे –धीरे कहने लगी – ‘वहीं बैंक में उनके साथ कोई एक औरत है , जो स्टेनो का काम करती है | सो उसके साथ रात गये तक घूमते रहते हैं | पता नहीं उस कलमुंही के भाई – बाप भी कैसे हैं .जो कुछ  कहते – सुनते नहीं | और मैं ज़रा सा भी कुछ कहूँ तो तुरंत डांट पड़ जाती है |’
  और क्या कहूँ ,ये सब तो उनकी पुरानी आदत है | शादी के पहले पिताजी ने न कुछ देखा न सुना | लड़का सर्विस में है ,बस इसी आधार पर गाय की तरह लाकर  पगहा पकड़ा दिया और अब हाल यह है कि हर   रात शराब पी के आयेंगे और   गंदी –गंदी गालियों का टेप खोल देंगे | जरा – सा भी कुछ  बोलूँ कि .... और   वह फिर सिसकियाँ भरने लगी |
  तब श्याम ने कहा था –‘रोओ नहीं शालो ! रोओ नहीं ,मेरा कलेजा निकला आ रहा है,  तुम्हें आज से पहले कभी भी रोते नहीं देखा | फिर आज कैसे देख सकता हूँ | चुप हो जाओ , घबड़ाओ नहीं | मैं चलूँगा तुम्हारे घर और उनसे बातें करूंगा | क्या माँ – बाप मर  गये तो शालो अनाथ हो गयी  ? उसको पूछने वाला कोई नहीं है ? तुम अपने को अनाथ न समझना | अभी मैं ज़िंदा हूँ , जिसे तुमने एक बार भाई कहा है और उसी रिश्ते को लेकर राखी भी भेजी है | ’
  और फिर दोनों भाव विह्वल होकर रो पड़े थे | फिर उस दिन श्याम ने काफी समझाया था और तीसरे दिन मंगलवार की शाम को शालिनी के घर आने का वचन भी दिया था | तब इस आश्वासन को पाकर वह बहुत हल्की -सी होकर अपने घर को लौट गयी थी |
  पर जाने किस संयोग से उसी दिन एक आदमी आ गया और रात की गाड़ी से उसे साथ  लेकर वह दिल्ली चला गया था |
   कार्यक्रम कुछ इस तरह था कि मंगलवार वहीं बीत गया |बुधवार को वापसी के लिए श्याम ने रात की ट्रेन पकड़ी ,पर हृदय न जाने क्यों खुद को कोसने लगा – ‘कितना बड़ा अभागा हूँ मैं कि एक बार भी वचन देकर पूरा न कर सका | न मित्र की ही शादी में जा सका और न शालिनी की ही , और इस बार भी वचन देने के बाद .... यही सोचते – सोचते जाने कब सो गया वह |
   सुबह किसी के हाथ का स्पर्श हुआ | नींद उचटी, बर्थ से उतरकर खिड़की से बाहर झांका देखा तो गाड़ी जंघई स्टेशन पर खड़ी थी | तभी ‘ताजा समाचार आज – आज ’ चिल्लाता हुआ एक अधेड़ व्यक्ति खिड़की की तरफ आया और श्याम ने हाथ बढ़ाकर उससे अखबार ले लिया और पैसे देकर  पुन: अपनी सीट पर आ बैठा | पन्ने पलट – पलट कर जल्दी – जल्दी हेडिंग  पढ़ने लगा कि सहसा उसकी निगाह एक हेडिंग पर टिक गयी लिखा था –‘जलकर युवती की मृत्यु ’
     २५ दिसम्बर ,नरहरपुरा स्थित विवाहिता शालिनी नामक एक युवती की जलकर मृत्यु हो गयी | लोंगो का संदेह है कि पति ने ही उसे जलाकर मार डाला | घटना के एक दिन पूर्व मार – पीट के साथ ही गाली - गलौज की आवाज पड़ोस वालों को सुनायी दी थी |पर अभी तक वास्तविक रहस्य का पता नहीं चल पाया है |
   पेपर श्याम के हाथों से छूटकर फर्श पर जा गिरा और कानों से एक आवाज टकरायी –‘भैया परसों जरूर आना |’
                                   रचनाकाल १९८० ईस्वी

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