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बुधवार, जून 10, 2015

अन्तर {कहानी } - डॉ. उमाशंकर चतुर्वेदी कंचन


‘ अबे वो ! ऐ ! ऐ रिक्शेवाले !आर्यनगर चलेगा ?’ होटल के सीढ़ी से उतरते ही  लम्बे छरहरे युवक ने कहा जो मोटे के हाथ में हाथ मिलाये हुए था |
  ‘ नहीं बाबूजी !मैं उधर नहीं जाऊँगा , मुझे पी.रोड जाना है रिक्सा जमा करने |’
  ‘ ये रिक्से वाले भी साले बड़े हरामी होते हैं ,खाली चले जायेंगे मगर यह नहीं कि कोई सवारी मिल गयी तो दो मिनट में उसे पहुंचा दे|’- मोटे युवक ने कहा |
  तभी उधर से एक और रिक्सा गुजरा तब पतले युवक ने ही फिर पूँछा – ‘क्यों जी रिक्सेवाले आर्यनगर  चलोगे ?’
 ‘ हाँ , चलूँगा क्यों नहीं बाबूजी |’
 ‘कितने पैसे लोगे ?’ समीप आकर रिक्शेवाले के मुँह के पास मुँह ले जाकर उसी पतले युवक ने पूछा |
 तब दूसरी तरफ मुख करके एक लम्बी सांस छोड़ते हुए रिक्शेवाले ने कहा – डेढ़ रुपया |’
‘क्यों, मुँह क्यों घुमा लिया ?’
 ‘आँय .. कुछ नहीं बाबूजी ऐसे ही |’
  ‘ हूँ ह : दर्शन करने को भी कभी नहीं मिला होगा और मुँह घुमा रहा है ’ -मोटे युवक ने उपेक्षात्मक ढंग से हँसते हुए कहा |
  और तब रिक्सावाला चल दिया कि क्षण भर मौन रहने के बाद पतले युवक ने कहा –क्यों डियर ! आज कैसी लग रही थी ?’
  ‘ कुछ मत पूछो,सच पूछो तो मैं उसकी आँखे देखकर ही क्त के रह जाता हूँ |’
  ‘ और मोटी के विषय में क्या ख़याल है तुम्हारा ?’
  ‘कहाँ यार तुम भी कुजड़ीन की बातें कर बैठे | अरे ! हाँ सुनो तो आज मैंने उससे पूछा कि सर्विस करोगी ?’ तो उसने कहा –‘ हाँ करूँगी,पर मिलेगी कहाँ ? आज कल सर्विस इतनी सस्ती कहाँ है जो हम जैसे गरीब लोंगो को मिल जाय |’
 ‘ मैंने कहा – मैं दूँगा तुम्हें सर्विस | मेरा फर्म है उसमें स्टोनो की जगह खाली है, टाईप तो कर ही लेती हो ?’
  तो उसने प्रसन्न मुद्रा में कहा – ‘हाँ कर लेती हूँ ’  बता रही थी दो ट्यूशन करती हूँ और सप्ताह में यहाँ दो दिन आकर आय व्यय का व्यौरा तैयार कर देती हूँ सो मैनेजर साहब से पचास रूपये मिल जाते हैं | घर में केवल मैं हूँ और बूढी माँ और एक छोटी बहिन |’
  मैंने सारी बातें सुनकर फिर उसी से कहा –‘चिंता न करो अगले सोमवार से आकर ज्वाईन कर लो पूरे तीन सौ रूपये मिलेंगे |’
  तब उसने कहा –‘इस अहसान के लिए जीवन भर ऋणी रहूँगी भाई साहब आपकी | ’
  मैंने कहा –‘मगर एक शर्त है ,
वह ये कि सप्ताह में एक दिन मेरा ‘स्पेशल’ रहेगा |’
  उसने आश्चर्य से पूछा –‘क्या मतलब ’
  मैंने हँसकर कहा –‘ समझदार के लिए इशारा ही काफी है , यह समझो मालामाल कर दूँगा | सोच समझकर बता देना ....| ’
  ‘अच्छा चलो अब कल की बात कल है न , उतरो चौराहा आ गया ‘ –मोटे युवक ने कहा |
  ‘यहाँ नहीं यार , वहाँ मोड़ तक चलो इतनी दूर रिक्से से आये और दस कदम पैदल चलोगे , तुम भी यार आदमी हो या घनचक्कर |’
  ‘ अच्छा चलो जी उस खम्भे के पास रोक दो ’ - मोटे युवक ने हँसते हुए रिक्शेवाले से कहा|
  रिक्सा खम्भे के पास आकर रुक गया तब उतरकर रिक्सेवाले को एक की नोट देते हुए पतले युवक ने कहा –‘लो राजा ! तुम भी क्या याद करोगे एकदम कड़ी –कड़ी नोट है |’और नोट पकड़ा कर दोनों चल दिए |
  तब रिक्शेवाले ने कहा –‘बाबूजी आठ आने और |’
  ‘चुपचाप रख लो बड़ी अच्छी नोट है |’
  
‘बाबूजी मगर आठ ....|’
  ‘अगर - मगर क्या एक रूपये से ज्यादे नहीं होते बहुत दे दिया , रात थी इसलिए , वरना मैं तो पचहत्तर पैसे ही देता हूँ | ’
  ‘पैसा न हो बाबूजी तो कोई बात नहीं , वैसे होता तो डेढ़ ही रूपये है | ये रेट बोर्ड देख लीजिए |
 ‘ अच्छा –अच्छा जा मुझे कानून मत सिखा |’
  ‘कानून नहीं सिखा रहा हूँ बाबूजी !जो उचित है उसे कह रहा हूँ ‘- रिक्सा आगे बढ़ाते  हुए रिक्शेवाले ने कहा |
  दो कदम आगे बढ़कर पुन :धीमी आवाज में रिक्सावाला बोल पड़ा –वाह रे भगवान् !तुम्हारी दुनिया में कैसे –कैसे लोग हैं , शराब पी –पीकर पैसे बर्बाद कर दे रहे हैं मगर किसी गरीब को दो  पैसे नहीं दे सकते , वह भी मजदूरी | छि : ...|
  ‘अबे ! अबे ! रुक रुक फिर उपदेश देना , ज़रा रुक , साला शराब पीना देख रहा है ‘ कहते हुए वही पतला युवक पास आकर एक चाटा  जड़ते हुए पुन : कहने लगा – ‘साले ! अपने खाने का ठिकाना नहीं और मुझे उचित - अनुचित बता रहा है |’फिर एक घूँसा जमा दिया |पेट में घूँसा लगना था कि रिक्सावाला लड़खड़ा कर खंभे से टकरा गया और उसका माथा फट गया तब हाथ से उसे दबाते हुए उसने कहा –‘बहुत अच्छा किया बाबूजी आपने , बहुत अच्छा किया , दोपहर से खाया नहीं था ,अच्छा हुआ आपने खाने भर को दे दिया | हम गरीबों का तो यही भोजन ही है आप अमीरों के लात – जूते |बस एक दो घूंसे का कष्ट और उठा लीजिए |’कि एक घूँसा और आ लगा , और लगते ही सड़क किनारे नाली में जा गिरा | इतने में पुलिस के दो नव जवान
आ पहुंचे और एक पतले युवक का चेहरा देखते ही पूछ बैठा –‘क्या हुआ बाबूजी ?’
  कुछ नहीं यार ! यही साला मुझे उचित –अनुचित बता रहा था ,चलाने को रिक्सा और उचित –अनुचित .... हरामखोर कहीं का ...|
  क्या करियेगा भैयाजी ! ये साले हरामखोर ऐसे होते ही हैं ,आदमी भी नहीं पहचानते | बीच में ही बात काटते हुए उसी पुलिसवाले ने कहा |
  जब वे लोग चले गये तो दूसरे जवान ने कहा अरे यार उसको तो देखो बेहोश पड़ा है | अरे ! उसका तो सिर भी फट गया है !’
  बेहोश नहीं हुआ है , नखड़ा कर रहा है साला ! चलो अपने उठकर चला जायेगा |’-पहले जवान ने कहा |
  तब दूसरे ने कुछ दूर जाकर पूछा –‘कौन थे ये लोग ?’
  ‘नहीं जानते ? इस इलाके के सबसे बड़े धनी सेठ के लड़के हैं ,कई मीलें चलती हैं , बसें भी चलती हैं इनकी ,और बड़े अच्छे आदमी हैं , महीने – पन्द्रह दिन में यूँ ही रास्ते में मिलेंगे तो दस पाँच के नोट पकड़ा देंगे और कहेंगे लो धरमचन्द दूध पी लेना ,नास्ता कर लेना , या सिनेमा देख लेना |’
  ‘और तुम धरम करते रहते हो |’-हँसते हुए दूसरे पुलिसवाले ने कहा |
  ‘बेटा इनकी तो ताकत इतनी है कि इंचार्ज साहब की भी खटिया खड़ी कर दें | अभी तो तुम नये  आये हो न , कुछ दिन रहो फिर तुम भी जान जाओगे |   
             रचनाकाल १९८० ई .

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