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सोमवार, मई 25, 2015

मर्यादा ( कहानी );डा.उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन'


     गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी जुलाई आते- आते मकान का निचला हिस्सा किराए पर उठ गया  और उसी तरह के पढ़ने वाले पाँच लड़के यहाँ आ बसे |

    जयन्तीके पिता के मरने के बाद घर का खर्च इसी किराए से चलता आया है | और ग़रीब दुखियारी माँ अपनी सयानी बेटी को लेकर कलेजे पे पत्थर रखे .अकेली -अकेली रह रही है|
    हर साल भलेमानुष लडकों को वह मकान का निचला हिस्सा किराए पर उठा देती और परीक्षाओं के बाद वे कमरे खाली हो जाते |
     पति नगर पालिका में क्लर्क थे | रिटायर होने में दो साल की देरी थी | तभी अचानक एक दिन दिल का दौरा पड़ा और चल बसे | तब से अब में जमीन- आसमान का -सा अंतर हो गया है | दस वर्ष गुजर गये इसी सहारे जीवन यापन करते |
     इस साल पैसों की तंगी और अधिक हो आयी थी | मंहगाई ने आधी जान निकाल ली थी | इस लिए पास –पड़ोस  के कई लोगों से जयन्ती की माँ ने कह  रखा था कि कोई अच्छा किरायेदार मिल जाय तो हमारे यहाँ भेज देना | सो बगल के प्रोफसर साहब ने इन्हीं लड़कों  को रखवा दिया था |
     आसमान में बादल आने शुरू हो गये थे और जब -तब बुँदे गिर जाती थी | वायुमण्डल में भीषण उमस थी | हवा रुक जाती तो घुटन सी होती  जी अकुलाता ,- सारे स्कूल  -कालेज खुल गये थे | जयंती ने भी इंटर में एडमिशन ले लिया था | आज पहले दिन ही वह कालेज गयी थी | शाम को तकरीबन वह चार बजे लौटी तो जीने वाला दरवाजा अंदर से बंद था | माँ ऊपर छत पर सुखाने के लिए गेहूँ धोकर डाल आयी थी | सो किवाड़े देकर बटोरने चली गयी थी |
जयंती ने सांकल खटखटायी |
       ख़ट-खट की आवाज ऊपर पहुँची तो माँ ने वहीँ से पुकार कर कहा-आयी बेटी !

      जयन्ती दरवाजा खुलने का इंतजार कर रही थी कि सहसा एक अटपटी आवाज उसे सुनाई दी अरे चुगद भाइयों, हेमा मालिनी को देखोगे ? और जयन्ती की निगाह उस ओर गई तो उसने देखा कि पांच लड़को में से एक खिड़की के पास खड़ा हौले हौले ये अटपटे बोल बोल रहा था |
      और तब उधर से एक मिश्रित आवाज सुनाई दी हाँ-हाँ कहाँ है हेमा ? जरूर देखेंगे ड्रीमगर्ल को, फिर एक पर एक खिड़की में सिर सटा सब देखने लगे, तभी किसी ने कहा - हाय राम,

हम तो घायल हो गये, लाल साड़ी जान मारे दे रही है !
      और तब वे सभी ठठाकर हँस पड़े, तब विनोद ने धीरे से कहा - हँस रहे हो मूर्खों रूप का अपमान कर रहे हो ?
      तब तक दरवाजा खुल गया और जयन्ती सिर झुकाये ऊपर चली गयी ऊपर आकर वह सीधे अपने कमरे में गई, और एक बार अपनी शकल खुद ही छोटे से शीशे में माँ की नजर बचा कर देखने लगी, दंग रह गई वह अपना रूप देखकर, सच ही लाल साड़ी उसे बहुत ही फब रही थी |
      इधर ये पाँचों खिड़की छोड़कर अब अपनी –अपनी जगह आकर बैठ गये थे |
     दिनेश चेहरे का रंग बदलते हुए गोविन्द की तरफ मुख़ातिब हो कहने लगा - ‘तुम तो अपनी उस काली कलूटी सरोजनी पर ही बड़ा नाज दिखा रहे थे , एक बार हँसकर बोल दी तो कुर्बान होने को तैयार हो गए . अब बोलो, दिलकश ‘ पंछी ‘ के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है ?
     ‘हाय अल्ला ,मेरा तो दिल बाहर निकला आ रहा है लालपरी को देखकर .सरोजनी की ऐसी - तैसी !’ दिनेश ने कहा |
     ‘खैर ,इसमें कोई शक नहीं कि लौंडिया सुंदर है ‘.जनक  ने कहा |
इनकी सुनने के बाद बृजेश ने शांत भाव से पूछा –‘लेकिन मैं पूछता हूँ उसे इतने जोर -जोर से हेमा मालिनी कहने की क्या जरूरत थी ?’सुन लिया होगा तो क्या कहती होगी मन में ?’
     तुम लोग उसकी नजर में ‘गुंडा’ साबित हो गए होगे , और मान  लो उसने अपनी माँ से कह दिया होगा तो ? यहाँ से निकाल दिए जाओगे हरामजादों ?’

    विनोद ने कहा –‘हूँ : अच्छी लड़कियां कभी इस तरह की शिकायत नहीं करतीं .उनको भी अपनी इज्जत का ख़याल रहता है | फिर इसमें बुरा लगने की क्या बात है ? हमनें कोई गाली तो नहीं दी है ,बल्कि उसे इज्जत ही बख्शी है ? हेमा मालिनी का रुतवा देकर | मैं कहता हूँ ‘वह तो मन ही मन खुश हो रही होगी ड्रीम गर्ल बनकर शट’अप !’बृजेश ने उसे डांट  पिलाई |
     तीसरे दिन रविवार पड़ गया | जयन्ती मकान की सफाई में लगी रही | दोपहर तक इधर से उधर कमरों की चीजें सम्हालती रही .फिर माँ के कहने पर खाने बैठ गयी |

     खाकर उठते ही तुरंत कपड़े धोने चल दी तो माँ ने कहा –‘थोड़ा सा आराम कर ले बेटी ! फिर धो लेना कपड़े |’
      और माँ के आदेश पर वह लेटने चली गई | जयंती दूसरी ओर मुंह किये लेटी थी | ‘सो गई बेटी ?-थोड़ी देर बाद माँ ने आकर पूछा |

      जयंती ने कहा –‘नहीं माँ जाग रही हूँ |
      एक बात कहूँ बेटी !.’
      कहो न माँ , ‘ एक क्यों , दो कहो- दस कहो |’
      तब माँ शांत भाव से कहने लगी –‘इस साल किरायेदार अच्छे नहीं मिले ,हमेशा उधम मचाये रहते हैं और पढ़ने के नाम  पर शायद किताब तक नहीं छूते | दिन भर जाने कैसे –कैसे गाने गाते रहते हैं |’
      ‘तो क्या हुआ माँ , अपने को क्या लेना - देना है ?’हमें सिर्फ किराए से मतलब है ‘|
     ‘लेकिन बेटी डर लगता है कि इन सब की हरकत देखकर कोई कीचड़ न उछालने लगे कि ‘गुंडों ‘ को बसा रखा है घर में |’
      हम गरीब तो ऐसे ही जिन्दगी से बेज़ार  हैं |ज़रा –सी कोई बात हो गई तो ,हमारा तो मरन ही समझो |’
      तब जयंती ने गंभीर भाव से कहा –‘इसकी चिंता मत करो माँ ,भगवान सबके रक्षक हैं |
दूसरे दिन सुबह ही कपड़ों की बाल्टी लिए नाचे आंगन में आकर वह कपडे साफ करने लगी | उस समय बगल के कमरे से आवाजें आती सुनाई दीं | उस क्षण जयन्ती को जाने कैसा – कैसा लगा | फिर भी वह धीरे –धीरे कपड़े साफ करती उन बातों को सुनती रही |
      जाने किसकी आवाज थी –जाने कौन कह रहा था ‘–द्रोपदी के पाँच पति थे , आप सब जानते हैं | अब अगर हमारी स्वप्न सुन्दरी को भी यदि पाँच पति मिल जाय तो आप लोगों को क्या कोई एतराज कोई है ?’

      ‘बिल्कुल नहीं , बिल्कुल नहीं ,हमें कोई एतराज नहीं | सबने एक स्वर से कहा - ‘तो मान लीजिये ,हम पाँचों के बीच भी कोई एक द्रोपदी आ जाती है तो आप लोग झगड़ा तो नहीं करेगें ?’
‘नहीं जी , झगड़ा क्यों करेगें , बिल्कुल नहीं |
      ‘लेकिन भाई ,प्रश्न यह उठता है कि द्रोपदी की शादी तब हुई , जब लक्ष्यबेध ’सम्पन्न हुआ और लक्ष्य बेध किया था अर्जुन ने | तो हम लोंगों में वह लक्ष्यबेध कौन करेगा ? अर्जुन कौन बनेगा ?’
      ‘मेरा सीनियर महमूद करेगा ,और कौन करेगा !’ दिनेश के पीठ पर हाथ फेरते हुए बृजेश ने कहा |
         और फिर शादी ?’
    ‘शादी तो युधिष्ठिर ने की थी .सबसे बड़े वही थे | हम लोगों में भी जो बड़ा होगा वही करेगा ‘-बृजेश ने कहा |
    ‘देखो भाई ,शादी चाहे जो कोई भी करे हमें एतराज नहीं ,मगर पदार्थ में हिस्सा सबका बराबर रहेगा ‘. गोविन्द ने हँसते हुए कहा |
    ‘हाँ भाई ,यह तो सही है ‘कहकहा लगाते हुए बाक़ी लोगों ने एक  साथ कहा – ‘पदार्थ का रस सब कोई बराबर लेगें |’
    जयन्ती ! ओ जयन्ती !’
    ‘आई अम्मा !’
    ‘अरे क्या कर रही है ?आज मौसी के घर नहीं जायेगी क्या ,रामू को राखी बाँधने ? ‘
    ‘बस जा रही हूँ माँ ‘
    और वह कमरे से निकल कर हाथ में पूजा की थाली लिए खट –खट जीने से नीचे उतर गयी हाल कमरे के पास जाकर एक बार उसने थाली पर नजर डाली .यह किनारे से गीली लाल रोली है ,ये अक्षत है ,इधर ये पाँच छोटी –छोटी फूल मालाएं हैं ,और ये रही लाल रेशमी डोरे में गुंथी चम् –चम् होती पाँच राखियाँ | फिर उसने धीरे से साँकल खट खटा दी |  दरवाजा खुल गया ,एक साथ सबकी निगाह जयन्ती की ओर खिंच गयी |
     इन लोगों को अपनी तरफ अवाक् देखते पाकर जयन्ती ने ओठों पसर मृदुल मुस्कान लाकर स्नेहभरे स्वर में कहा –‘भाई साहब ,आप सबको राखी बाँधने आयी हूँ ,आज रक्षाबन्धन है न !,
तब बिना एक शब्द बोले वे पाँचों अपनी सीटों से उठकर खड़े हो गए |
     दस –बारह मिनट बाद ही सलोने मुखड़े का उज्ज्वल आलोक विखेरती किसी देवमन्दिर की दीपशिखा  सरीखी   स्निग्ध मधुर और पावन कांटी लिए ,गुलाब की पंखुड़ियों जैसे ओठों में मंद मुस्कान छिपाये जयन्ती पूजा की थाली लिए ऊपर पहुंची तो माँ ने अचरज कर  के पूछा –‘कहाँ चली गयी थी ?’तब जयन्ती ने मधुर हँसी के बीच कहा –‘’शेरों को जंजीरें पहिनाने गयी थी माँ ‘’
      .......इधर नीचे बड़े कमरे में सन्नाटा तोड़कर बृजेश कह रहा था प’’छोटी बहिन आयी और ये राखियाँ बाँधकर खाली हाथ चली गयी कैसे नालायक हैं हम लोग ,धिक्कार है हमें | निकालो –निकालो ,पाँच – पाँच रूपये सब कोई | मैं अभी फौरन उसे दे आऊँ ‘’‘