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गुरुवार, जुलाई 04, 2013

छोटी सी बात ' कहानी '

'तू यहाँ बैठी गाना सुन रही है और हम तुझे खोजते -खोजते परेशान हो गए !
'गाना नहीं भैय्या, भजन ।'
'चुप शरारती कहीं की ! घर में मां  परेशान  कि क्या हो गया अभी तक नहीं आयी और हमने घर से स्कूल तक
एक कर डाला और तू यहाँ गन्दगी में बैठी गाना सुन रही है !'
'भैय्या  जी ,बिटिया का कोई दोष नहीं, दोष मेरा है  यह तो दरवाजे पर खड़ी - खड़ी गीत सुन रही थी  मैंने ही इसे अन्दर बुला लिया'
'चुप रहो ! बड़े गवैय्या बने हो ! फिर कभी इसे बुलाने का साहस मत करना और तू जो इधर आयी तो तेरी चमड़ी उधेड़ दूँगा समझी ?'
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'शंकर ! श्रद्धा  मिली ?'
'मिल गयी माँ ,आ रही है पीछे - पीछे
'कहाँ थी ?'
'गली के कोने पर वो बाबा रहता है न , उसी के यहाँ गूदड़ो में बठी भजन सुन रही थी ।'
'हे भगवान , क्यों री तू वहाँ क्यों गयी थी उस भिखारी के पास ? ख़बरदार , फिर से उधर पैर रक्खा तो।'
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'इधर कई दिनों से बिटिया नहीं दिखाई दे रही है?भैय्या जी , कहीं  बाहर गयी है क्या ?'
'क्यों पूछ रहे हो , तुमसे क्या मतलब ?'
'भैय्या जी नाराज क्यों हो रहे हैं ? बच्चे तो सबके होते है , वे तो भगवान के स्वरूप होते है हम लोगों के बाबाओं के यही न बच्चे हैं , या हमारी कोई घर गृहस्थी है ?'
'अच्छा -अच्छा समझ गये , तो आपकी बिटिया को बुखार आ रहा है '
'बुखार आ रहा है ? मैं भी जरा देख लेता।'
'आओ चलो !देखो उसे तीन चार दिनों से नींद  नहीं आ रही है,बहुत बेचैन है।'
'सरधा बिटिया !'
'बाबा ! भजन सुना दो बाबा !'
'सुनाऊंगा बेटी !जरूर सुनाऊंगा।'
' इसे भजन सुना दूँ भैय्या जी ?'
'हाँ ,हाँ , धीरे -धीरे सुनाओ कम से कम इसकी छटपटाहट तो दूर हो।'
'सुनो  बिटिया गीत सुनो' -
'ठुमकि चलत रामचन्द्र बाजत पैजनियाँ ...............
'अरे अम्मा ! देखो बाबा का भजन सुनते -सुनते यह श्रद्धा सो गयी अब जल्दी ठीक हो जायेगी ।'
'बाबा, तब तो तुम कल भी आ जाना डाक्टर ने कहा है कि जब गहरी नींद सोयेगी, तभी ठीक हो सकेगी
' अच्छा एक  बात तो बताओ  तुम करते क्या हो ?'
'कुछ नहीं माता  जी ,बस यूँ ही जिन्दगी कट रही है।'
'आख़िरकार कुछ नहीं करते तो खाते -पीते कहाँ से हो ?' 
'भोजन तो माता जी शाम को राधाकृष्ण के मंदिर में मिल जाता हैवहीं दो चार भजन प्रभु के आगे सुना देता हूँ और प्रसाद भी मिल जाता है और गुजारा हो जाता है।'
'अच्छा जाओ,कल भी आ जाना ।'
'जरूर आऊँगा माता जी , अपनी रानी बिटिया के लिए मैं जरूर आऊँगा।'
'अरे शंकर , देखो न बाबा के भजन सुनते-सुनते श्रद्धा चार ही दिन में ठीक हो गयी और डाक्टर की दवा धरी की धरी रह गयी !'
'अम्मा , श्रद्धा को बाबा के भजन बहुत अच्छे लगते हैं लो बाबा आ गया !'
'बाबा ,अब तो श्रद्धा ठीक हो गयी

'अच्छा हुआ माता  जी, बिटिया ठीक हो गयी ,भगवान करें अब रानी बिटिया को कभी कोई रोग न हो ।'
'अच्छा ये लो पाँच रूपये पाँच दिन के , तुम्हारा मेहनताना और अब कल से फिर मत आना । श्रद्धा के बाबूजी बिगड़ते हैं ।'
'ठीक है माता जी , अब नहीं आऊँगा मैं ।'
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'मालकिन  जी सीढ़ी पर हई पाँच ठे रूपया गिरल मिलल ह..।
'दिखाना जरा ।'
'लेई देखीं ।'
' अरे,यह तो वही  बाबा वाला नोट है ,जो अभी- अभी मैंने उसे दिया था ,कैसे गिर गया उसके हाथ से ? जाओ -जाओ दे आओ उसे । ' 
'घड़ी  पीछे नौकर लौट आया और उसने बतलाया -
'मलकिन , उनकी कोठरी में त ताला बंद बा ।'
'अच्छा ,जब मिले तो दे देना उसे '
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'महीनों बिट गए ,पर उस कोठरी का ताला न खुला
वह प्रभु का गीत गानेवाला बाबा जाने कहाँ चला गया
  श्रद्धा स्कूल जाती तो प्रतिदिन उस बंद दरवाजे को देख मन ही मन कहती, - 'बाबा ,तुम कब आओगे ?'

 


2 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी दिल को छूती है। 5 रूपैय्या पाठकों को जितना कोंचता है काश उतना बिटिया की माँ को भी..

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  2. आज सम्वेदना को लोग पैसे से तौलने लगे हैं ,काश !लोग भावनाओं को समझते ...

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