पृष्ठ

मंगलवार, अप्रैल 16, 2013

तीन दोहे

दर्पण के हो सामने जैसे कोई सूर .
वैसे विधवा माँग से दूर बहुत सिंदूर ..

अमराई में अब नहीं पहले जैसा छाँव 
बात -बात में काटने दौ ड़ रहा है  गाँव  

रिश्ते अब मरने लगे टूट रहे सम्बन्ध 
पैसों से ही हो रहा रिश्तों का अनुबन्ध 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें