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सोमवार, जुलाई 22, 2013

मेरे जैसा गाँव नहीं हैं

दरिया में अब नाव नहीं है, अमराई में छाँव नहीं है

गाँव बहुत से होंगे लेकिन मेरे जैसा गाँव  नहीं है

पग -पग पर छेंका करते है

आँखों को सेंका  करते हैं

घुरहू के आँगन में रोंड़ा

धनिया पर फेंका करते हैं

दो क्षण को जो सुख दे जाये वह लोगो में भाव नहीं है

  गाँव बहुत से होंगे लेकिन मेरे जैसा गाँव  नहीं है

चाल चलन है रहन नहीं है

  द्वार बहुत है सहन नहीं है

कहने को ये गाँव  की मेरी

लड़की है पर बहन नहीं है

कौवा मामा कभी बोलते थे वैसा अब काँव नहीं है

  गाँव बहुत से होंगे लेकिन मेरे जैसा गाँव  नहीं है

बिच्छु जैसे डंक नहीं हैं

सब राजा हैं , रंक नहीं हैं

मेरी पीड़ा को सहला दे

आँचल वैसे अंक नहीं हैं

दरिया दिल वाली दरिया है पर दरिया में नाँव  नहीं है

पहले जैसा राज नहीं है

स्वर है लेकिन साज नहीं है

साड़ी   में अब भी घूंघट  है

किन्तु आँख  में लाज नहीं है

श्रद्धा भाव जनमने वाली पायल है पर पाँव नहीं है

  गाँव बहुत से होंगे लेकिन मेरे जैसा गाँव  नहीं हैं

गुरुवार, जुलाई 04, 2013

छोटी सी बात ' कहानी '

'तू यहाँ बैठी गाना सुन रही है और हम तुझे खोजते -खोजते परेशान हो गए !
'गाना नहीं भैय्या, भजन ।'
'चुप शरारती कहीं की ! घर में मां  परेशान  कि क्या हो गया अभी तक नहीं आयी और हमने घर से स्कूल तक
एक कर डाला और तू यहाँ गन्दगी में बैठी गाना सुन रही है !'
'भैय्या  जी ,बिटिया का कोई दोष नहीं, दोष मेरा है  यह तो दरवाजे पर खड़ी - खड़ी गीत सुन रही थी  मैंने ही इसे अन्दर बुला लिया'
'चुप रहो ! बड़े गवैय्या बने हो ! फिर कभी इसे बुलाने का साहस मत करना और तू जो इधर आयी तो तेरी चमड़ी उधेड़ दूँगा समझी ?'
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'शंकर ! श्रद्धा  मिली ?'
'मिल गयी माँ ,आ रही है पीछे - पीछे
'कहाँ थी ?'
'गली के कोने पर वो बाबा रहता है न , उसी के यहाँ गूदड़ो में बठी भजन सुन रही थी ।'
'हे भगवान , क्यों री तू वहाँ क्यों गयी थी उस भिखारी के पास ? ख़बरदार , फिर से उधर पैर रक्खा तो।'
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'इधर कई दिनों से बिटिया नहीं दिखाई दे रही है?भैय्या जी , कहीं  बाहर गयी है क्या ?'
'क्यों पूछ रहे हो , तुमसे क्या मतलब ?'
'भैय्या जी नाराज क्यों हो रहे हैं ? बच्चे तो सबके होते है , वे तो भगवान के स्वरूप होते है हम लोगों के बाबाओं के यही न बच्चे हैं , या हमारी कोई घर गृहस्थी है ?'
'अच्छा -अच्छा समझ गये , तो आपकी बिटिया को बुखार आ रहा है '
'बुखार आ रहा है ? मैं भी जरा देख लेता।'
'आओ चलो !देखो उसे तीन चार दिनों से नींद  नहीं आ रही है,बहुत बेचैन है।'
'सरधा बिटिया !'
'बाबा ! भजन सुना दो बाबा !'
'सुनाऊंगा बेटी !जरूर सुनाऊंगा।'
' इसे भजन सुना दूँ भैय्या जी ?'
'हाँ ,हाँ , धीरे -धीरे सुनाओ कम से कम इसकी छटपटाहट तो दूर हो।'
'सुनो  बिटिया गीत सुनो' -
'ठुमकि चलत रामचन्द्र बाजत पैजनियाँ ...............
'अरे अम्मा ! देखो बाबा का भजन सुनते -सुनते यह श्रद्धा सो गयी अब जल्दी ठीक हो जायेगी ।'
'बाबा, तब तो तुम कल भी आ जाना डाक्टर ने कहा है कि जब गहरी नींद सोयेगी, तभी ठीक हो सकेगी
' अच्छा एक  बात तो बताओ  तुम करते क्या हो ?'
'कुछ नहीं माता  जी ,बस यूँ ही जिन्दगी कट रही है।'
'आख़िरकार कुछ नहीं करते तो खाते -पीते कहाँ से हो ?' 
'भोजन तो माता जी शाम को राधाकृष्ण के मंदिर में मिल जाता हैवहीं दो चार भजन प्रभु के आगे सुना देता हूँ और प्रसाद भी मिल जाता है और गुजारा हो जाता है।'
'अच्छा जाओ,कल भी आ जाना ।'
'जरूर आऊँगा माता जी , अपनी रानी बिटिया के लिए मैं जरूर आऊँगा।'
'अरे शंकर , देखो न बाबा के भजन सुनते-सुनते श्रद्धा चार ही दिन में ठीक हो गयी और डाक्टर की दवा धरी की धरी रह गयी !'
'अम्मा , श्रद्धा को बाबा के भजन बहुत अच्छे लगते हैं लो बाबा आ गया !'
'बाबा ,अब तो श्रद्धा ठीक हो गयी

'अच्छा हुआ माता  जी, बिटिया ठीक हो गयी ,भगवान करें अब रानी बिटिया को कभी कोई रोग न हो ।'
'अच्छा ये लो पाँच रूपये पाँच दिन के , तुम्हारा मेहनताना और अब कल से फिर मत आना । श्रद्धा के बाबूजी बिगड़ते हैं ।'
'ठीक है माता जी , अब नहीं आऊँगा मैं ।'
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'मालकिन  जी सीढ़ी पर हई पाँच ठे रूपया गिरल मिलल ह..।
'दिखाना जरा ।'
'लेई देखीं ।'
' अरे,यह तो वही  बाबा वाला नोट है ,जो अभी- अभी मैंने उसे दिया था ,कैसे गिर गया उसके हाथ से ? जाओ -जाओ दे आओ उसे । ' 
'घड़ी  पीछे नौकर लौट आया और उसने बतलाया -
'मलकिन , उनकी कोठरी में त ताला बंद बा ।'
'अच्छा ,जब मिले तो दे देना उसे '
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'महीनों बिट गए ,पर उस कोठरी का ताला न खुला
वह प्रभु का गीत गानेवाला बाबा जाने कहाँ चला गया
  श्रद्धा स्कूल जाती तो प्रतिदिन उस बंद दरवाजे को देख मन ही मन कहती, - 'बाबा ,तुम कब आओगे ?'

 


मंगलवार, जून 25, 2013




दक्षिण भारत यात्रा के दौरान  कन्याकुमारी में सूर्योदय दर्शन की उत्सुकता से समुद्र तट जा पहुंचा ,प्रात कालीन सौन्दर्य देख ही रहा था की एक घड़ी बेचनेवाला आ गया और पत्नी सविता जी से गिडगिडाने लगा - बहन जी सुबह की बोहनी करा दीजिये भैया जी के लिए ये घड़ी ले लीजिए , उसकी शुद्ध हिंदी सुनकर पत्नी ने पूछा कहाँ के रहने वाले हो ? बोला -जौनपुर का पत्नी को दया आ गई , बोलीं -पेट के लिए परदेस में इतना दूर आकर उद्यम कर रहा है , ले लीजिये , मैं उनका दया भाव लखकर उन्हें मना  न कर सका ,और वे घड़ीवाले को पैसे देकर मेरी कलाई में प्रेम से उस घड़ी को बाँधने लगीं , मैं भी इस तरह खड़ा हो गया जैसे घड़ी न होकर कोई अमुल्य वस्तु हो और मन ही मन मुस्कराता रहा [

,मैं उस फल को तुरन्त फ़ेंक दिया




त्रिवेन्द्रम में मैं कंचन अपनी पत्नी सविता चतुर्वेदी के साथ स्टीमर पर सवार होकर जंगल झाड़ियो के बीच होता हुआ समुद्र तट पर पहुंचा।रास्ते में आम सरीखा फल दिखाई दिया जिसे मैं तोड़ लिया तभी स्टीमर चालक ने कहा भूलकर भी मुंह में मत डालियेगा यह जहर है दो मिनट में काम  तमाम हो जायेगा ,मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ,मैं उस फल को तुरन्त फ़ेंक दिया

शनिवार, जून 01, 2013







सभी चित्र दक्षिण भारत यात्रा के अंतर्गत कन्याकुमारी में त्रिवेणी घाट के हैं जहाँ की शोभा देखते बन रही थी

सोमवार, मई 27, 2013

रामेश्वर में डॉ सविता चतुर्वेदी के साथ डॉ कंचन

रविवार, मई 26, 2013

डॉ ब्रजेश शर्मा एवं डॉ संजीव शर्मा को अपनी पुस्तक प्रदान करते हुए 
डॉ उमाशंकर चतुर्वेदी कंचन .

गुरुवार, मई 16, 2013








अखिल भारतीय ब्राह्मण  महासभा  कार्यक्रम के दौरान धर्मसंघ दुर्गाकुंड वाराणसी में प्रथमतया भगवान परशुराम की मूर्ति की स्थापना डॉ उमाशंकर चतुर्वेदी कंचन के आचार्यत्व में  की गई।  जिसका लोकार्पण श्रीमाता प्रसाद पाण्डेय  विधान सभा अध्यक्ष एवं श्री विजय कुमार मिश्र उर्जा राज्य मंत्री उत्तर प्रदेश  द्वारा सोलह मई दो हजार तेरह को किया गया । 

सोमवार, मई 13, 2013

सोमवार, अप्रैल 22, 2013

दो दोहे

बाधाओं से जूझकर       जो करता संघर्ष 
वह निश्चित ही एक दिन पा  लेता उत्कर्ष . 

मनसा वाचा कर्मणा जो भी करता पाप 
वह अपने ही चाल से     पाता है संताप .




पांडिचेरी में सपत्निक डाक्टर कंचन 
  •  तिरुपति बालाजी में डाक्टर सविता चतुर्वेदी के साथ कंचनजी 

  •  तिरुमला की पहाड़ी पर डाक्टर कंचन एवं सविता 

 तिरुमला की पहाड़ी पर डाक्टर कंचन एवं सविता व पुत्री अनुरंजिका 
 तिरुपति  बालाजी में कंचन 

चेन्नई में परिवार सहित डाक्टर कंचन