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बुधवार, मार्च 21, 2012

प्रो . हरिप्रसाद अधिकारी को अभिनन्दन पत्र सौंपते कविवर 'कंचन '
लाली लख  सब  कर रहे भूल - भूल कर भूल
नहीं  पता  निर्गन्ध हैं      ये  सेमर   के फूल
चौकठ, देहरी जब  रहा  तब थी उसकी लाज 
चौकठ  बिना  कपाट  है   नये - नये  अंदाज  
स्वारथ में तन मन  बिका टूट गया व्यवहार 
मुक्त   सभी   के   मन    हुए   टूटे    मुक्ताहार 
कौन जानता किस समय घटना घटे विचित्र 
मित्र  शत्रु   बन   जाएगा,  शत्रु   बनेगा  मित्र 
अनुसुय्या  सीता  गयीं  चला  गया  वह राज 
पत्नी  व्रत  हैं  माँगती  सभी  लड़कियाँ  आज 
   

सोमवार, मार्च 19, 2012

मैं क्या करूँ ?

प्यार करना नहीं चाहता हूँ मगर-
                  हाथ कोई बढ़ाये तो मैं क्या करूँ ? 

रूप की चाँदनी में नहाया नहीं,
नीर नयनों से मैंने बहाया नहीं, 
नैन को मूँद कर चल रहा हूँ  मगर-
                  नैन कोई लड़ाये तो मैं क्या करूँ ?

हाथ से मैं कलम तक छुआ भी नहीं,
शब्द का बोध मुझको हुआ भी नहीं, 
गीत गाना नहीं चाहता हूँ मगर-
                  गीत कोई कढ़ाये तो मैं क्या करूँ ?

हाथ छेनी हथौड़ी गहा तक नहीं,
मूर्तिकारों के संग में रहा तक नहीं,
मूर्ति छूने से डरता रहा हूँ मगर-
                  मूर्ति कोई गढ़ाए तो मैं क्या करूँ ?

मन्दिरों में कभी पग बढाया नहीं,
देवताओं को मस्तक झुकाया नहीं,
फिर हृदय से मुझे देवता मानकर-
                 फूल कोई चढ़ाये तो मैं क्या करूँ ?  
   


शनिवार, मार्च 10, 2012

  • कंचन जी की कृति ' गंगा ' का द्वितीय आवरण
डॉ उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' के प्रबंध काव्य 'गंगा' का आवरण पृष्ट  

गुरुवार, मार्च 08, 2012

क्रोध लोभ ईर्ष्या सभी होली में दो जार 
मन से मन को जोड़कर सबको बाँटो प्यार  

बुधवार, मार्च 07, 2012

होली में मदमस्त हो करते सब हुडदंग
कीचड़ गोबर धूल संग फेंके रंग बिरंग 
सबकी अपनी रीति है सबका अपना ढंग 
कोई प्रेम परोसता कोई करता जंग 
मान मनौवल ना चले चले जोर बस जंग 
किस पर कितना डाल दें पिचकारी से रंग 
फागुन फूहड़ हो गया या मनमौज उमंग 
कोई नंगा हो चला है कोई अधनंग 
अंदर से बाहर रंगे पी पी कर के भंग 
मसक  अंग सब देत हैं बरबस करते तंग