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सोमवार, जनवरी 09, 2012

लेखनी कुछ बोल दे तू

लेखनी कुछ बोल दे तू
जिन्दगी का मोल दे तू
रागिनी का राग टूटा
छंद लय का भाव टूटा
छोड़ जग के आज क्रंदन
जोड़ दे तू प्यार बंधन
इस परत को खोल दे तू
लेखनी कुछ बोल दे तू
बंद कर यह दग्ध मंथन
लेप कर दे मलय चन्दन
प्यास चातक सी बनी है
आज घातक सी ठनी है
इन सभी का पोल दे तू
लेखनी कुछ बोल दे तू
तम कलुष सारे बहाकर
ज्ञान गंगा में नहाकर
तार वीड़ा के बजा दे
कल्पनाओ को सजा दे
इस तरह रस घोल दे तू
लेखनी कुछ बोल दे तू

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