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गुरुवार, अक्तूबर 11, 2012

गाँव हमारा शहर हो गया

गाँव हमारा शहर हो गया .
सुन्दर सुन्दर बाग़ कट गये 
नहर  कूप तालाब पट गाये 
आपस के भाई चारे के -
जाने कैसे भाव घट गए 
 आरक्षण की राजनीति में जात-पात का जहर बो गया .         
गाँव हमारा शहर हो गया . 
दूध दही का लोप हो गया 
जाने किसका कोप हो गया 
डाँटी सास बहू को तो फिर -
समझो गोला तोप  हो गया 
सम्बन्धों का ताना -बाना आपे से ही बहर हो गया 
गाँव हमारा शहर हो गया 
भयवद्दी का भात नहीं है 
जनवासा बारात  नहीं   है   
दरवाजे खटिया पर सोये -
अब वैसी अवकात नहीं है 
राग द्वेष के खींच तान में    -  कुछ  ऐसा माहौल हो गया 
गाँव हमारा शहर हो गया 
अब कोई कोल्हाड़ नहीं  है 
भड़भूजे  का भाड़ नहीं है  
सुबह शाम औरतें जा सकें -
ऐसा जंगल झाड़ नहीं है .
पटवारी की पत्रावलि में जाने कैसे कहाँ खो गया 
गाँव हमारा शहर हो गया 
लोगों में वह भाव नहीं है 
पहले जैसा चाव नहीं है 
दिल में दर्द उठा करता है -
यद्यपि दिल में घाव नहीं है 
ऊषा बेला में ही तीखे धूपों वाला प्रहर हो गया 
गाँव हमारा शहर हो गया 
अधनंगी लड़की दिखती हैं 
मोबाइल पर खत लिखती हैं 
वृद्धजनों के माप दण्ड पर-
एक मिनट भी ना टिकती हैं 
दो पीढ़ी के अंतराल में फैशन का ये कहर हो गया 
गाँव हमारा शहर हो गया 

शनिवार, अक्तूबर 06, 2012

डॉ उमाशंकर चतुर्वेदी कंचन एवं डॉ सविता चतुर्वेदी प्रातः भ्रमण के दौरान बी एच यू  परिसर में 

बुधवार, अगस्त 22, 2012



खजुराहो में सपत्निक डा .उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन '

रविवार, जुलाई 15, 2012

शुक्रवार, जुलाई 13, 2012

मंसूरी में परिवार के साथ

मंसूरी में परिवार के साथ डा . उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' 

मंसूरी में प्रकाशेश्वर महादेव

मंसूरी में प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर के बाहर डा . उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' डा . सविता एवं संस्कृति चतुर्वेदी 

बुधवार, जुलाई 11, 2012

बद्रीनाथ जी में

बद्रीनाथ जी में डा . सविता चतुर्वेदी ,डा . उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' संस्कृति चतुर्वेदी एवं श्रीमती सुभावती पाण्डेय 

मंगलवार, जुलाई 10, 2012

सोमवार, जुलाई 09, 2012

परमार्थ निकेतन ऋषिकेश में

परमार्थ निकेतन ऋषिकेश में डा .उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' एवं उनकी पत्नी 

ऋषिकेश में रामझूला के पास

ऋषिकेश में रामझूला के पास बाएं से संस्कृति चतुर्वेदी ,डा . सविता चतुर्वेदी डा . उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' एवं  श्री मती सुभावती पाण्डेय 

ऋषिकेश में डा . उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन'

ऋषिकेश में डा . उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' परिवार के साथ 

मंगलवार, जुलाई 03, 2012

लक्ष्मण झूला ऋषिकेश में पत्नी   डा.सविता चतुर्वेदी के साथ डा . उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन'

रविवार, जुलाई 01, 2012

देव प्रयाग में कंचन

देव प्रयाग में चिन्तन की मुद्रा में डा. उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन '

मंगलवार, जून 26, 2012

अलकनन्दा की गोद में सिला पर  पत्नी डाक्टर सविता चतुर्वेदी एवं पुत्री संस्कृति के साथ ' कंचन जी '

गुरुवार, जून 21, 2012

यमुनोत्री धाम जाते वक्त सयाना चट्टी में  डा. उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन ' के साथ एल उमाशंकर सिंह 

शुक्रवार, जून 08, 2012

हरिद्वार में गंगा सेतु पर पत्नी पुत्री एवम सास के साथ डॉ उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' 

मंगलवार, मई 08, 2012

संस्कृति प्रकाशन के उद्घाटन के अवसर पर
 डॉ. सूर्यकुमार शुक्ल आई. पी. एस. को  स्मृति चिन्ह प्रदान करते हुए
 डॉ. उमाशंकर चतुर्वेदी कंचन    

मंगलवार, मई 01, 2012

नर्मदा किनारे

नर्मदा किनारे शशिकांत द्विवेदी के साथ उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन'

धुआंधार जबलपुर में

धुआंधार जबलपुर में शशिकांत द्विवेदी के साथ उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन'

बरमान,नरसिंहपुर

बरमान,नरसिंहपुर निवासी श्री लालजी शर्मा के साथ डाक्टर उमाशंकर चतुर्वेदी ' कंचन '

पंडित पद्माकर चौबे के जन्मदिन पर

  1. पंडित पद्माकर चौबे  के जन्मदिन पर काव्यपत्र समर्पित करते हुए डाक्टर उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन '

बुधवार, मार्च 21, 2012

प्रो . हरिप्रसाद अधिकारी को अभिनन्दन पत्र सौंपते कविवर 'कंचन '
लाली लख  सब  कर रहे भूल - भूल कर भूल
नहीं  पता  निर्गन्ध हैं      ये  सेमर   के फूल
चौकठ, देहरी जब  रहा  तब थी उसकी लाज 
चौकठ  बिना  कपाट  है   नये - नये  अंदाज  
स्वारथ में तन मन  बिका टूट गया व्यवहार 
मुक्त   सभी   के   मन    हुए   टूटे    मुक्ताहार 
कौन जानता किस समय घटना घटे विचित्र 
मित्र  शत्रु   बन   जाएगा,  शत्रु   बनेगा  मित्र 
अनुसुय्या  सीता  गयीं  चला  गया  वह राज 
पत्नी  व्रत  हैं  माँगती  सभी  लड़कियाँ  आज 
   

सोमवार, मार्च 19, 2012

मैं क्या करूँ ?

प्यार करना नहीं चाहता हूँ मगर-
                  हाथ कोई बढ़ाये तो मैं क्या करूँ ? 

रूप की चाँदनी में नहाया नहीं,
नीर नयनों से मैंने बहाया नहीं, 
नैन को मूँद कर चल रहा हूँ  मगर-
                  नैन कोई लड़ाये तो मैं क्या करूँ ?

हाथ से मैं कलम तक छुआ भी नहीं,
शब्द का बोध मुझको हुआ भी नहीं, 
गीत गाना नहीं चाहता हूँ मगर-
                  गीत कोई कढ़ाये तो मैं क्या करूँ ?

हाथ छेनी हथौड़ी गहा तक नहीं,
मूर्तिकारों के संग में रहा तक नहीं,
मूर्ति छूने से डरता रहा हूँ मगर-
                  मूर्ति कोई गढ़ाए तो मैं क्या करूँ ?

मन्दिरों में कभी पग बढाया नहीं,
देवताओं को मस्तक झुकाया नहीं,
फिर हृदय से मुझे देवता मानकर-
                 फूल कोई चढ़ाये तो मैं क्या करूँ ?  
   


शनिवार, मार्च 10, 2012

  • कंचन जी की कृति ' गंगा ' का द्वितीय आवरण
डॉ उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' के प्रबंध काव्य 'गंगा' का आवरण पृष्ट  

गुरुवार, मार्च 08, 2012

क्रोध लोभ ईर्ष्या सभी होली में दो जार 
मन से मन को जोड़कर सबको बाँटो प्यार  

बुधवार, मार्च 07, 2012

होली में मदमस्त हो करते सब हुडदंग
कीचड़ गोबर धूल संग फेंके रंग बिरंग 
सबकी अपनी रीति है सबका अपना ढंग 
कोई प्रेम परोसता कोई करता जंग 
मान मनौवल ना चले चले जोर बस जंग 
किस पर कितना डाल दें पिचकारी से रंग 
फागुन फूहड़ हो गया या मनमौज उमंग 
कोई नंगा हो चला है कोई अधनंग 
अंदर से बाहर रंगे पी पी कर के भंग 
मसक  अंग सब देत हैं बरबस करते तंग

गुरुवार, फ़रवरी 23, 2012

डॉ. उमा शंकर चतुर्वेदी 'कंचन'की कृति "एक सुखद स्पर्श है कविता" का मुख पृष्ठ
डॉ. उमा शंकर चतुर्वेदी 'कंचन'की कृति "सहज निबन्ध" का मुख पृष्ठ

बुधवार, फ़रवरी 22, 2012

डॉ. उमा शंकर चतुर्वेदी 'कंचन' की काव्यकृति "हिन्दी" का आवरण पृष्ठ
डॉ. उमा शंकर चतुर्वेदी 'कंचन' के कहानी संग्रह "मृगतृष्णा" का मुख पृष्ठ
डॉ. उमा शंकर चतुर्वेदी 'कंचन' के कहानी संग्रह "सुहागिन" का मुख पृष्ठ

सोमवार, जनवरी 09, 2012

लेखनी कुछ बोल दे तू

लेखनी कुछ बोल दे तू
जिन्दगी का मोल दे तू
रागिनी का राग टूटा
छंद लय का भाव टूटा
छोड़ जग के आज क्रंदन
जोड़ दे तू प्यार बंधन
इस परत को खोल दे तू
लेखनी कुछ बोल दे तू
बंद कर यह दग्ध मंथन
लेप कर दे मलय चन्दन
प्यास चातक सी बनी है
आज घातक सी ठनी है
इन सभी का पोल दे तू
लेखनी कुछ बोल दे तू
तम कलुष सारे बहाकर
ज्ञान गंगा में नहाकर
तार वीड़ा के बजा दे
कल्पनाओ को सजा दे
इस तरह रस घोल दे तू
लेखनी कुछ बोल दे तू

रविवार, जनवरी 08, 2012

आया बमभोला था



मुना
देवी माता पिता पंडित ब्रजनाथ जी के

कई हुए पूतो में सही में वे सपूत थे
मालवा के रहे इस हेतु मालवीय हुए
मदन मोहन महामना देव दूत थे
देखने में सीधे सादे भव्य रूप रंग वाले
किन्तु बुद्धि सम्पदा की खान वे अकूत थे
त्यागी तपोनिष्ट हुए खुद में विशिष्ट हुए
बहुतों के इष्ट हुए किन्तु अवधूत थे
सृष्टि की समुन्नति उदात्त भावना रखे
उसे समाज प्यार से पुकारता महामना
दृष्टि की पवित्रता का भान, ज्ञान से लखे
उसे समाज प्यार से पुकारता महामना
वृष्टि का स्वाभाव ले उदार भावना रखे
उसे समाज प्यार से पुकारता महामना
हृष्टि की सुमुग्धता सदा समाज हेतु हो
तो समाज प्यार से पुकारता महामना।।
कर्म ही है पूजा जान कर्मठी सा कार्य करे
तो समाज प्यार से पुकारता महामना
धर्मं को है धारता धर्मं को संवारता
सुधर्म के लिए धरा पुकारती महामना
शर्म त्याग लोक के लिए जो याचना करे
उसे समाज प्यार से पुकारता महामना
मर्म दीन-दुखियों का और सभ्य सुखियों का
जानता, उसे धरा पुकारती महामना।।
देश धर्मं-वेश धर्मं को जो पहचानता
उसे समाज प्यार से पुकारता महामना
साधना करे परन्तु साध ना रखे कभी
उसे समाज प्यार से पुकारता महामना
बांधना जो जानता परन्तु खुद बंधा नहीं
उसे समाज प्यार से पुकारता महामना
कर के खुद आराधना स्वयं आराध्य हो गया
उसे समाज प्यार से पुकारता महामना।।
हिन्दुओं की कोमल कड़ी कही टूट जाये
इसीलिए रुढ़िवादियों को कस डांटे थे
धर्मगत कुरीतियों को नीतिगत अनीतियों को
दूर करने के लिए ही जनेऊ बांटे थे
देश धर्मं फुले फले सुन्दराति सुन्दर हो
ध्यान रख उसको नियम बीच छांटे थे
आज महामना महामना जग हता है
किन्तु महामना राह पग-पग कांटे थे।।
उनका निज ढंग रहा पुलकित हर अंग रहा
जीता हर जंग जाने कला कहा सीखा था
शब्द शब्द मंत्र रहा भाव बोध तंत्र रहा
प्राण भी स्वतंत्र, नेक नेम नग नीका था
हाथ में छड़ी रही वाणी की जड़ी रही
श्वेत पाग के समक्ष राजमुकुट फीका था
पकी-पकी मोछ रही पकी-पकी सोच रही
उन्नत ललाट पर गोल-गोल टीका था।।
ऊँच-नीच भेद-भाव तीन और तेरह का
दक्षिण से पूर्व पश्चिमोत्तर टटोला था
तब जाके ब्राह्मण महासंघ को बनाया
और सभी द्विज एक यह महामंत्र बोला था
गोल मेज काँट सेज सभी जगे दिव्य तेज
शिक्षा के लिए महान एक केंद्र खोला था
गले में दुपट्टा डील-डौल हट्टा-कट्टा रहा
महामना रूप धारे आया बमभोला था

शनिवार, जनवरी 07, 2012


डॉ. उमा शंकर चतुर्वेदी 'कंचन' की कृति "गंगा" का लोकार्पण करते हुए बाएँ से के. न. गोविन्दाचार्य, शंकर प्रसाद जायसवाल, . पी. सिंह एवं कंचन जी। नीचे के चित्र में डॉ. कंचन, अविनाश चतुर्वेदी और डॉ. संजीव शर्मा।