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बुधवार, फ़रवरी 02, 2011


मैं अपनी कुटिया में खुश हूँ तुम अपना महल सजाना ।

जिस घर से गांठ बंधी है

रखना उसकी मर्यादा ,

मैं क्या था तुम क्या थी

यह सोच न करना ज्यादा ,

वह महके सदा गली प्रिय

जो द्वार तुम्हारे जाये।

मैं निकलूं कभी गली उस तुम घूंघट खींच लजाना ।

मैं अपनी कुटिया में खुश हूँ तुम अपना महल सजाना ॥

संध्या में देहरी पर

तुम एक जलाना बाती ,

चमके चाद सितारे ,

तब मन की पढ़ना पाती ,

जब गहन निशा में चातक

की चीख कभी टकराये ,

तब तब उठ करके साधो तुम अपने साज बजाना ।

मैं अपनी कुटिया में खुश हूँ तुम अपना महल सजाना ॥

हीरा मोती पन्ना

सब कुछ है पास तुम्हारे ,

मैं क्या दे सकता हूँ तुमको

बोलो ? क्या पास हमारे ,

संयम धीरज का बंधन

जब तोड़ जिया अकुलाये ,

तो लाज बचाये रखना नारी का लाज खजाना ।

मैं अपनी कुटिया में खुश हूँ तुम अपना महल सजाना ॥