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बुधवार, फ़रवरी 02, 2011


मैं अपनी कुटिया में खुश हूँ तुम अपना महल सजाना ।

जिस घर से गांठ बंधी है

रखना उसकी मर्यादा ,

मैं क्या था तुम क्या थी

यह सोच न करना ज्यादा ,

वह महके सदा गली प्रिय

जो द्वार तुम्हारे जाये।

मैं निकलूं कभी गली उस तुम घूंघट खींच लजाना ।

मैं अपनी कुटिया में खुश हूँ तुम अपना महल सजाना ॥

संध्या में देहरी पर

तुम एक जलाना बाती ,

चमके चाद सितारे ,

तब मन की पढ़ना पाती ,

जब गहन निशा में चातक

की चीख कभी टकराये ,

तब तब उठ करके साधो तुम अपने साज बजाना ।

मैं अपनी कुटिया में खुश हूँ तुम अपना महल सजाना ॥

हीरा मोती पन्ना

सब कुछ है पास तुम्हारे ,

मैं क्या दे सकता हूँ तुमको

बोलो ? क्या पास हमारे ,

संयम धीरज का बंधन

जब तोड़ जिया अकुलाये ,

तो लाज बचाये रखना नारी का लाज खजाना ।

मैं अपनी कुटिया में खुश हूँ तुम अपना महल सजाना ॥

बुधवार, जनवरी 26, 2011

वाराणसी । गणतंत्र दिवस के अवसर पर रविन्द्र पुरी स्थित प्रो० स्व० सत्यव्रत शर्मा जी के आवास पर उनकी धर्मपत्नी सावित्री शर्मा (माता जी ) की अध्यक्षता में एक काव्य गोष्ठी संपन्न हुई जिसमे श्री उमाकांत श्रीवास्तव, डॉ० ब्रजेश शर्मा, डॉ० विन्ध्याचल पाण्डेय सगुन, डॉ० संजीव शर्मा, डॉ० उमाशंकर चतुर्वेदी कंचन एवं डॉ० श्रीमती सविता चतुर्वेदी सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।





श्री उमाकांत श्रीवास्तव, डॉ० ब्रजेश शर्मा, डॉ० विन्ध्याचल पाण्डेय सगुन, डॉ० संजीव शर्मा, डॉ० उमाशंकर चतुर्वेदी कंचन एवं डॉ० श्रीमती सविता चतुर्वेदी।






श्री उमाकांत श्रीवास्तव, डॉ० ब्रजेश शर्मा, डॉ० विन्ध्याचल पाण्डेय सगुन, डॉ० संजीव शर्मा, डॉ उमाशंकर चतुर्वेदी कंचन, पूजनीया सावित्री शर्मा (माताजी ) एवं डॉ० श्रीमती सविता चतुर्वेदी ।

भारत देश महान हमारा , शुभ गणतंत्र हमारा है ।

पर जाने क्या बात है कंचन मन परतंत्र हमारा है ॥

देश हुआ आजाद मगर

हमको न मिली आजादी ।

हिन्दी चेरी बनी हुई

अंग्रेजी है शहजादी॥

न्यायालय ,कार्यालय मुंह ताके यन्त्र हमारा है

भारत देश महान हमारा शुभ गणतंत्र हमारा है ॥

जिसे विचार कहा जाता है

वही ओढ़कर खादी ।

भ्रष्ट आचरण वालों की

हम बढ़ा रहे आबादी ॥

गांधी का ले नाम लूटते, यह षडयंत्र हमारा है ।

भारत देश महान हमारा शुभ गणतंत्र हमारा है॥

स्वतंत्रता की समझ न पाये

अभी तलक परिभाषा ।

कंचन को कोई समझाये

किससे रख्खे आशा ।।.

हम स्वतन्त्र अधिकार हमारा मौलिक मन्त्र हमारा है ।

भारत देश महान हमारा शुभ गणतंत्र हमारा है ॥

शनिवार, जनवरी 15, 2011


कौन किससे प्रथम रूठा

गीत को संगीत में तुम बाँधकर कर दो अनूठा ।

देख करके छवि तुम्हारी

होश खो तारे पड़े हैं

मुग्ध होकर भाव विह्वल

कवि अथक हारे पड़े हैं

गीत को तुम प्रीत पूर्वक निज अधर से कर दो जूठा ।

गीत को संगीत में तुम बाँधकर कर दो अनूठा । ।

मन लुभाने के लिए

साधन यहाँ कितने बने हैं

फूल पाती तरु लता -

जलजात ये जितने घने हैं ।

देखने पर सत्य तुम , लगता है यह संसार झूठा ।

गीत को संगीत में तुम बाँधकर कर दो अनूठा । ।

मधुर अनुपम राग से

अनुराग की पीयूष धारा

कर प्रवाहित चिद्गमन में

सींच दो चेतन हमारा ।

प्रीत तेरी मृदुलता जीवन हमारा वृक्ष ठूँठा ।

गीत को संगीत में तुम बाँधकर कर दो अनूठा । ।

गीत यह प्रत्यक्ष मेरे

प्रेम की तस्वीर है

नयनशर से विध्द मेरे

चित्त की मृदुपीर है ।

तुम मुझे बस यह बता दो कौन किससे प्रथम रूठा ।

गीत को संगीत में तुम बाँधकर कर दो अनूठा । ।