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मंगलवार, दिसंबर 14, 2010


आँखों का अंजन हो जाता

कालिख भी बनकर यदि उनके आँखों का अंजन हो जाता।
जनम - जनम से प्यास लगी है
मन में ये अभिलाष जगी है
छूकर उनके पारस कर को लौह रूप कंचन हो जाता ।
कालिख भी बन कर यदि उनके आँखों का अंजन हो जाता॥
स्वप्न कभी ऐसा कुछ देखा
हाय विधाता का यह लेखा
टूट - टूट कर ये शीशा दिल यदि उनका दर्पण हो जाता ।
कालिख भी बन कर यदि उनके आँखों का अंजन हो जाता॥
कई जनम से भाव हिया के
हो जाती यदि पास पिया के
स्वप्नों में भी यदि क्षणभर को मेरा तन अर्पण हों जाता ।
कालिख भी बन कर यदि उनके आँखों का अंजन हो जाता ॥
आंसू ही गंगाजल होता
चरणों को मल-मलकर धोता
किसी जनम में मिल जाते वे मेरे भी तर्पण हो जाते ।
कालिख भी बन कर यदि उनके आँखों का अंजन हो जाता ॥

1 टिप्पणी:

  1. अद्भुत, अभिराम काव्य कृति उमा शंकर जी| बधाई|
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