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शनिवार, सितंबर 11, 2010

अच्छा होता भारत से उठ जाती बेईमानी की अर्थी
फलत विघ्नविनाशक जी की आज चतुर्थी
अपने आस पास का करते दूर प्रदुसन
तो सच मुच सार्थक होता ये पर्व पर्युषण
घन वरसा मन भिज गया
भोले भाव में भूल-भूल कर तीज गया
तीनो पर्वो के संग सुन्दर ईद बधाई
कंचन का स्वीकार करे सब पाठक भाई

शुक्रवार, सितंबर 10, 2010

मैं तुम्हें श्रृंगार देता
कब कहाँ अवसर मिला कि मैं तुम्हे श्रृंगार देता
भावनाओ मे सदा बहता रहा
गैर को अपना सदा कहता रहा
रेत को पानी समझ मै हिरनसा
दौड़ता गिरता रहा ढहता रहा
तुम नहीं मुझको मिली कि मै तुम्हे उपहार देता
कब कहाँ अवसर मिला कि मैं तुम्हे श्रृंगार देता
चाँदनी थी चाँद भी उस ओर था
रात्रि की निस्तब्धता का शोर था
स्वच्छ जल धारा नदी का छोर था
तुम रही उस पार मै इस ओर था
हाथ बढ़ पाये नहीं कि मै तुम्हे अभिसार देता
कब कहाँ अवसर मिला कि मैं तुम्हे श्रृंगार देता
लाजवंती सा तुम्हारा सिमट जाना
वल्लरी जैसे ह्रदय से लिपट जाना
स्वप्न में हर रात सब होता रहा
दूर जाना और क्षण में निकट आना
चेतना तब थी नहीं की मै तुम्हे यह प्यार देता
कब कहाँ अवसर मिला कि मैं तुम्हे श्रृंगार देता