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रविवार, जुलाई 25, 2010

कहाँ करे विश्राम
सुबह हुई जीवन की मेरे और हुई कब शाम ।
पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
नयना हो गये गंगा-यमुना
अश्रु न फिर भी रीते ।
जीवन रण में लड़े बहुत पर
एक युद्ध न जीते ॥
हुई कौन सी गलती जिससे हुए विधाता वाम ।
पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
उड़ पाऊं उन्मुक्त गगन में
समझू जग की रीत ।
तब तक हाथ छुड़ाकर भागा
मेरे मन का मीत
सबके वादे झूठे निकले कोई न आया काम ।
पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
एक रतन ऐसा भी पाया
जिसे संजोते जनम गँवाय ।
राह कटीली राह रसीली
कहीं धुप तो कहीं है छाया ॥
पागल मन यह समझ न पाये कहाँ करे विश्राम ।
पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
जगती का ये खेल अनूठा
बिना पिया के जीवन ठुठा।
माया में मन समझ न पाया
कौन है सच्चा , कौन है झूठा ॥
अर्थ ढूंढ़ता रहा अहर्निश किन्तु रहा निष्काम ।
पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. जगती का ये खेल अनूठा
    बिना पिया के जीवन ठुठा
    ..यही सार तत्व है.

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  2. हेडर में बनारस का चित्र तो अच्छा लग रहा था..और ढूंढिए और सुंदर टेम्पलेट्स मिलेंगे. शब्द वैरिफिकेशन भी आपने नहीं हटाया...?

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