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शुक्रवार, जुलाई 09, 2010

नयनों की प्याली में अमृत
नयनों की प्याली में अमृत बार - बार तुमने परसा है।
लुक छिपकर तेरा वह मिलना
गन्धित पुष्प कली सा खिलना
कुंचित केशों का विन्यास
तेरे अधरों का मधुहा
याद मुझे है, लखने खातिर बार - बार ये मन तरसा है।
नयनों की प्याली में अमृत बार - बार तुमने परसा है।
चैत चाँदनी की वे रातें
तेरी मधुर - मधुर वे बातें
अमराई के मध्य बोलना
मीठा - मीठा दर्द घोलना
खेल - खेल में बीत गये दिन आखों ने सब कुछ दरसा है।
नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥
खुश होना और कभी रिसाना
रोब देखाना और मनाना
बिन बोले तेरा रह जाना
आखों से सब कुछ कह जाना
तेरी मनवाली कर - करके , बार - बार ये मन हरषा है।
नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥
रिस्ते नाते टूट गये सब
काफी पीछे छूट गये सब
हाथों को ही बस मलना है
निरा अकेले ही चलना है ।
जब -जब याद किया मैंने इन आखों से ही मन बरषा है।
नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥



6 टिप्‍पणियां:

  1. @ खेल - खेल में बीत गये दिन आखों ने सब कुछ दरसा है।
    नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥

    बहुत अद्भुत लिखते है आप, काफी कुछ सिखने को मिलेगा आपसे

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  2. वर्ड वेरिफिकेशन अगर हटा सकें तो ठीक रहेगा टिपण्णी करने में

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  3. रिस्ते नाते टूट गये सब
    काफी पीछे छूट गये सब
    हाथों को ही बस मलना है
    निरा अकेले ही चलना है ।
    जब -जब याद किया मैंने इन आखों से ही मन बरषा है।
    नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥
    ...वाह !
    आपको पा कर ब्लाग जगत धन्य हुआ.
    बहुत कुछ पढने को मिलेगा.
    आप अपनी कहानियों के लिये एक अलग ब्लाग बनायें तो अछ्हा लगेगा.

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