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शुक्रवार, जुलाई 02, 2010

दरिया में अब नाव नहीं है, अमराई में छाँव नहीं है


गांव बहुत से होगे लेकिन मेरे जैसा गांव नहीं है


पग -पग पर छेका करते है


आँखों को सेका करते हैं


घुरहू के आँगन में रोंड़ा


धनिया पर फेका करते हैं


दो क्षण को जो सुख दे जाये वह लोगो में भाव नहीं है


गांव बहुत से होंगे लेकिन मेरे जैसा गांव नहीं है


चाल चलन है रहन नहीं है


द्वार बहुत है सहन नहीं है


कहने को ये गांव की मेरी


लड़की है पर बहन नहीं है


कौवा मामा कभी बोलते थे वैसा अब काँव नहीं है


गांव बहुत से होंगे लेकिन मेरे जैसा गांव नहीं है


बिच्छु जैसे डंक नहीं हैं


सब राजा हैं , रंक नहीं हैं


मेरी पीड़ा को सहला दे


आँचल वैसे अंक नहीं हैं


दरिया दिल वाली दरिया है पर दरिया में नांव नहीं है


पहले जैसा राज नहीं है


स्वर है लेकिन साज नहीं है


साडी में अब भी घुघट है


किन्तु आंख में लाज नहीं है


श्रद्धा भाव जन्मने वाली पायल है पर पाँव नहीं है


गांव बहुत से होंगे लेकिन मेरे जैसा गांव नहीं हैं



1 टिप्पणी:

  1. दरिया में अब नाव नहीं है, अमराई में छाँव नहीं है
    गांव बहुत से होगे लेकिन मेरे जैसा गांव नहीं है
    ...vaah kya baat hai.
    blag jagat men aapkaa svaagat hai.
    घुघट=?

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