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सोमवार, जुलाई 05, 2010


प्रीत की चुनर रंगा दो


कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो


सत्य को मैं सत्य मानु


झूठ को पहचान पाऊ


नेत्र से जो दूर है


अस्तित्व उसका जान पाऊं


दूर होवे द्वेष ईर्ष्या मन का मेरे तम भगा दो


कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो


बात कैसी है अनूठी


प्रीत करना और रोना


रत्न अपने हाथ लेकर


और अपने हाथ खोना


मैं समझ पाऊं सभी कुछ भाव तुम मेरे जगा दो


कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो


दीप लेकर आ पड़ा है


द्वार पर कोई पुजारी


मन करे करना वही तुम


प्रार्थना सुन लो हमारी ।


बस यही इच्छा कि फिर से प्रीत कि चूनर रंगा दो


कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो


मै स्वयं को भुला जाऊं


इस तरह कि प्रीत दे दो ,


रात - दिन मै गीत गाऊ


इस तरह के गीत दे दो


दे नहीं सकती तो मोइके से मुझे डोली मँगा दो


कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो



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